Home>News>national

भारत के 10 संरचनात्मक संकट: सार्वजनिक स्वास्थ्य की बदहाली और चिकित्सा जनित कंगाली का दुष्चक्र

स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी का मात्र 1.8%। आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (OOPE) के चलते प्रतिवर्ष 5 से 6 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए जाते हैं। सीएचसी में 70-80% विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद रिक्त हैं।

Byथिंक इंडिया राष्ट्रीय अन्वेषण ब्यूरो
Published On 24 सित॰ 2026
भारत के 10 संरचनात्मक संकट: सार्वजनिक स्वास्थ्य की बदहाली और चिकित्सा जनित कंगाली का दुष्चक्र
Representative Image [ThinkIndia.press Bureau]

Key Highlights

  • स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी का मात्र 1.8%; ब्रिक्स देशों में सबसे कम (ब्राजील 4%, दक्षिण अफ्रीका 4.5% खर्च करते हैं)।
  • सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में शल्य चिकित्सक, स्त्री रोग और बाल रोग विशेषज्ञों के 70-80% पद रिक्त पड़े हैं।
  • आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर (OOPE) के कारण हर साल 5 से 6 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए जाते हैं।
  • आयुष्मान भारत (PM-JAY) बीमा मॉडल ओपीडी खर्च (65% चिकित्सा खर्च) को कवर नहीं करता; निजी अस्पतालों द्वारा धोखाधड़ीपूर्ण क्लेम।
थिंक इंडिया न्यूज़ प्रेस | विशेष राष्ट्रीय अन्वेषण: भारत के 10 संरचनात्मक संकट — गहन पड़ताल (खंड 2)

नई दिल्ली — किसी भी कल्याणकारी राज्य की पहली कसौटी उसके नागरिकों का स्वास्थ्य होता है। भारत ने ऐतिहासिक रूप से स्वास्थ्य क्षेत्र को उत्पादक निवेश के बजाय एक गैर-प्राथमिक सामाजिक व्यय मानकर उपेक्षित किया है। भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय (केंद्र और राज्यों को मिलाकर) वर्षों तक सकल घरेलू उत्पाद के 1.2 से 1.4 प्रतिशत के बीच झूलता रहा है, जो हाल के वर्षों में मामूली बढ़कर लगभग 1.8 प्रतिशत तक पहुंचा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2017) द्वारा 2025 तक इसे 2.5 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया था, जो आज भी अधूरा है।

विश्व बैंक के तुलनात्मक आंकड़े दर्शाते हैं कि ब्रिक्स देशों में भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय सबसे निचले पायदानों में शामिल है (ब्राजील लगभग 4%, दक्षिण अफ्रीका 4.5% खर्च करता है)। इस बजटीय निर्वात का परिणाम यह हुआ है कि देश की अधिकांश आबादी को बुनियादी इलाज के लिए भी अनियंत्रित, मुनाफाखोर निजी स्वास्थ्य सेवा बाजार की दया पर निर्भर रहना पड़ता है।

                  जीडीपी के अनुपात में स्वास्थ्य व्यय
         ┌──────────────────────────────────────────────┐
         │ भारत         █ 1.8%                          │
         │ चीन          ███ 3.8%                        │
         │ ब्राजील       ████ 4.0%                       │
         │ ब्रिटेन       ████████ 8.0%                   │
         │ ओईसीडी औसत   █████████ 9.2%                  │
         └──────────────────────────────────────────────┘

5.2 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) का जीर्ण-शीर्ण ढांचा

ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी (Rural Health Statistics) रिपोर्टें ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढांचे की बदहाली का कच्चा चिट्ठा खोलती हैं:

  • मानव संसाधन की भारी कमी: सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में शल्य चिकित्सक (Surgeons), स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynecologists), बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatricians) और सामान्य चिकित्सकों के 70 से 80 प्रतिशत पद रिक्त पड़े हैं।
  • उपकरण और दवाओं का अभाव: अधिकांश प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) केवल 'रेफरल सेंटर' बनकर रह गए हैं, जहाँ से मरीजों को सीधे जिला अस्पताल भेज दिया जाता है। बुनियादी रक्त जांच, एक्स-रे, आवश्यक जीवन रक्षक एंटीबायोटिक्स और प्रसव पूर्व देखभाल की सुविधाएं न होने के कारण गरीब ग्रामीणों को झोलाछाप डॉक्टरों (Quacks) की शरण लेनी पड़ती है।
  • जिला अस्पतालों पर अत्यधिक दबाव: प्राथमिक स्तर पर रोगों की रोकथाम और प्रारंभिक उपचार न होने के कारण जिला अस्पतालों और एम्स (AIIMS) जैसे शीर्ष संस्थानों में मरीजों की अमानवीय भीड़ उमड़ती है। ओपीडी में एक डॉक्टर को प्रतिदिन 100 से 150 मरीज देखने पड़ते हैं, जिससे वह प्रत्येक मरीज को औसतन दो मिनट का समय भी नहीं दे पाता।

5.3 'आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर' (OOPE) और चिकित्सा जनित कंगाली

भारत में स्वास्थ्य सेवा का सबसे दुखद पहलू 'आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर' (जेब से होने वाला खर्च) है। यद्यपि सरकार का दावा है कि नीति आयोग के प्रयासों से यह घटकर कुल स्वास्थ्य खर्च के 47-48 प्रतिशत पर आया है, किंतु वैश्विक मानकों (जहाँ यह 15-20% से कम होता है) की तुलना में यह अब भी अत्यंत उच्च है।

                 चिकित्सा जनित गरीबी का चक्र
                              │
            ┌─────────────────┴─────────────────┐
            ▼                                   ▼
    परिवार में गंभीर बीमारी             दवाइयों व जांचों पर
     (हार्ट अटैक, कैंसर)                अत्यधिक खर्च (OOPE)
            │                                   │
            └─────────────────┬─────────────────┘
                              ▼
            जमीन, मकान या गहने बेचने की नौबत
                              ▼
            साहूकारों के कर्ज के जाल में फँसना
                              ▼
           प्रतिवर्ष 5 से 6 करोड़ लोग गरीबी रेखा
                के नीचे धकेल दिए जाते हैं

निजी कॉरपोरेट अस्पतालों ने चिकित्सा को विशुद्ध व्यापार बना दिया है। अनावश्यक पैथोलॉजी जांचें, जरूरत से ज्यादा दिनों तक आईसीयू (ICU) में भर्ती रखना, ब्रांडेड महंगी दवाइयां लिखना और गैर-जरूरी सिजेरियन प्रसव करवाना एक संस्थागत नियम बन चुका है। 'क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट' (Clinical Establishments Act) को राज्य सरकारों द्वारा शिथिलता से लागू किए जाने के कारण निजी अस्पतालों की दरों और कार्यप्रणाली पर कोई प्रभावी सामाजिक व प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है।

5.4 आयुष्मान भारत (PM-JAY): राहत या संरचनात्मक भ्रम?

केंद्र सरकार की 'आयुष्मान भारत - प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना' (PM-JAY) ने गरीब परिवारों को प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये तक का द्वितीयक और तृतीयक अस्पताल कवरेज देकर निस्संदेह राहत प्रदान की है। हाल ही में इसे 70 वर्ष से अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों तक विस्तारित किया गया है। किंतु इस बीमा-आधारित मॉडल की अपनी गंभीर सीमाएं हैं:

  • बीमा मॉडल बनाम सार्वजनिक अवसंरचना: बीमा कंपनियां और निजी अस्पताल इस योजना के केंद्र में हैं। कई निजी अस्पताल कम पैकेज दरों का हवाला देकर आयुष्मान कार्ड धारकों को भर्ती करने से मना कर देते हैं या धोखाधड़ीपूर्ण क्लेम (Fraudulent Claims) बनाकर सरकारी धन की हेराफेरी करते हैं।
  • बाह्य रोगी (OPD) खर्च बाहर: आयुष्मान भारत अस्पताल में भर्ती (In-patient) होने पर ही लागू होता है, जबकि एक गरीब परिवार के कुल स्वास्थ्य व्यय का 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बाह्य रोगी विभाग (OPD), नियमित दवाओं और डायग्नोस्टिक जांचों पर खर्च होता है, जो इस योजना के दायरे में नहीं आता।
  • दीर्घकालिक समाधान नहीं: सरकारी खजाने का पैसा निजी बीमा कंपनियों और निजी अस्पतालों के मुनाफे में जाने के बजाय यदि नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों, जिला अस्पतालों और प्राथमिक केंद्रों के निर्माण में लगाया जाता, तो देश की स्थायी स्वास्थ्य परिसंपत्तियों का निर्माण होता।

5.5 गैर-संचारी रोगों (NCDs) का सुनामी और कार्यबल का संकट

भारत वर्तमान में दोहरे रोग भार (Dual Disease Burden) से जूझ रहा है। एक तरफ तपेदिक (TB), मलेरिया और डेंगू जैसी संक्रामक बीमारियां समाप्त नहीं हुई हैं, तो दूसरी तरफ जीवनशैली जनित गैर-संचारी रोगों—हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर, मधुमेह और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD)—ने देश को अपनी चपेट में ले लिया है। भारत को आज "विश्व की मधुमेह राजधानी" कहा जाता है, जहाँ 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं। आईसीएमआर (ICMR) के अनुसार, देश में होने वाली कुल मौतों में से 65 प्रतिशत से अधिक मौतें अब NCDs के कारण हो रही हैं।

इसके समानांतर, स्वास्थ्य कार्यबल का घनत्व विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के न्यूनतम मानक (प्रति 10,000 आबादी पर 44.5 स्वास्थ्य कर्मी) से काफी नीचे है। देश में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात कागजों पर भले ही 1:1000 के करीब दिखाया जाता हो (आयुष डॉक्टरों को मिलाकर), किंतु एलोपैथिक डॉक्टरों का वास्तविक अनुपात अत्यंत असंतुलित है। 75 प्रतिशत से अधिक योग्य डॉक्टर और 80 प्रतिशत अस्पताल शहरी क्षेत्रों में केंद्रित हैं, जबकि 65 प्रतिशत आबादी ग्रामीण भारत में निवास करती है। रेजिडेंट डॉक्टरों को मेडिकल कॉलेजों में 80 से 100 घंटे प्रति सप्ताह काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे उनकी शारीरिक और मानसिक कार्यक्षमता टूट जाती है।

5.6 स्वास्थ्य सुधारों की अनिवार्य कार्ययोजना (Healthcare Roadmap)

  1. 'स्वास्थ्य का अधिकार' (Right to Health) का संवैधानिक दर्जा: राजस्थान की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाकर आपातकालीन चिकित्सा को नागरिकों का कानूनी अधिकार बनाया जाए, जिसमें किसी भी निजी या सरकारी अस्पताल द्वारा इलाज से इनकार करने पर कठोर दंड हो।
  2. सार्वजनिक खरीद और निःशुल्क जेनेरिक दवाएं: तमिलनाडु और राजस्थान के सफल मॉडल को पूरे देश में लागू करते हुए सभी सरकारी अस्पतालों में ओपीडी और आईपीडी के लिए 100% आवश्यक दवाएं और परीक्षण निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएं।
  3. डॉक्टरों के लिए ग्रामीण सेवा और सम्मानजनक प्रोत्साहन: ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने वाले चिकित्सकों को विशेष आवासीय भत्ते, बच्चों की उच्च शिक्षा में कोटा और पीजी प्रवेश में ठोस वरीयता देकर ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
  4. राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा उपकर: तंबाकू उत्पादों, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड जंक फूड और मीठे शीतल पेयों पर 50 प्रतिशत तक का 'सिन टैक्स' (Sin Tax) लगाकर उस पूरे राजस्व को प्राथमिक स्वास्थ्य अवसंरचना के आधुनिकीकरण में हस्तांतरित किया जाए।
Advertisement
प्रायोजित विज्ञापन
Bright Books Logo
होलसेल एवं रिटेलगढ़वा • पलामू • झारखंड

ब्राइट बुक्स एवं स्टेशनरी (BrightBooks & Stationery)

✏️ प्रीमियम नोटबुक्स, जर्नल्स, आर्ट & क्राफ्ट सप्लाइज | लग्जरी व राइटिंग पेन, ऑफिस स्टेशनरी | Doms, Brustro, Pentonic पर विशेष छूट!

📍 मदरसा रोड, ब्राइट फ्यूचर स्कूल के पास, गढ़वा (झारखंड) 822114 | 🌐 brightbookstore.in | 📞 +91 87893 20315

Frequently Asked Questions (FAQ)

भारत में चिकित्सा खर्च (OOPE) के कारण हर साल कितने लोग गरीबी रेखा के नीचे जाते हैं?

विभिन्न स्वास्थ्य अध्ययनों और नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, आउट-ऑफ-पॉकेट मेडिकल खर्च के कारण प्रतिवर्ष 5 से 6 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए जाते हैं।

आयुष्मान भारत (PM-JAY) की प्रमुख संरचनात्मक सीमा क्या है?

यह योजना केवल अस्पताल में भर्ती (In-patient) होने पर लागू होती है, जबकि गरीब परिवारों के कुल स्वास्थ्य खर्च का 65% से अधिक हिस्सा ओपीडी (OPD), नियमित दवाओं और जांचों पर होता है जो इसमें शामिल नहीं है।

इस खबर को शेयर करें (Share this News)

विशेष प्रायोजक एवं स्थानीय सेवाएं (Special Sponsors)

Verified Partners
प्रीमियम स्टेशनरी
Bright Books Logo
गढ़वा • पलामू का टॉप स्टोर

ब्राइट बुक्स एवं स्टेशनरी

BrightBooks & Stationery

✏️ प्रीमियम नोटबुक्स, डायरी, जर्नल्स, आर्ट & क्राफ्ट सप्लाइज, राइटिंग पेन एवं स्कूल-ऑफिस स्टेशनरी थोक व खुदरा भाव में उपलब्ध।

📍 पता: मदरसा रोड, ब्राइट फ्यूचर स्कूल के पास, गढ़वा (झारखंड) 822114

🌐 वेबसाइट:https://brightbookstore.in

वेबसाइट व सॉफ्टवेयर
Rupesh Vishwakarma
फुल-स्टैक वेब डेवलपर

रूपेश विश्वकर्मा (Website Designer)

Next.js, React, Web Apps & Portals

🚀 क्या आपको अपनी दुकान, कोचिंग, स्कूल, हॉस्पिटल या न्यूज़ पोर्टल के लिए प्रीमियम वेबसाइट चाहिए? सुपरफास्ट लोडिंग, मोबाइल-फ्रेंडली व Google SEO सपोर्ट।

💼 विशेषता: 100+ सफल वेबसाइट्स, ई-कॉमर्स स्टोर, बिलिंग सिस्टम व 24/7 सपोर्ट।

इस खबर को शेयर करें

Logo

ThinkIndia.press Support

Bureau Desk Online

ThinkIndia Digital Bureau • 2026