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'डिजिटल अरेस्ट' साइबर अपराध: तकनीकी कार्यप्रणाली, विधिक यथार्थ और नागरिक सुरक्षा संदर्शिका

भारतीय कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' का कोई विधिक अस्तित्व नहीं है। फर्जी पुलिस वर्दी, जाली सुप्रीम कोर्ट वारंट और मनोवैज्ञानिक किडनैपिंग के जरिए करोड़ों की ठगी करने वाले साइबर सिंडिकेट का पर्दाफाश और आपातकालीन सुरक्षा गाइड।

Byथिंक इंडिया साइबर सुरक्षा अन्वेषण डेस्क
Published On 24 सित॰ 2026
'डिजिटल अरेस्ट' साइबर अपराध: तकनीकी कार्यप्रणाली, विधिक यथार्थ और नागरिक सुरक्षा संदर्शिका
Representative Image [ThinkIndia.press Bureau]

Key Highlights

  • विधिक यथार्थ: भारतीय कानून (BNSS/BNS) में 'डिजिटल अरेस्ट' नाम का कोई प्रावधान नहीं है; कोई भी एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती।
  • ठगी का 4-चरणीय चक्रव्यूह: IVR कूरियर कॉल, फर्जी पुलिस स्टेशन व नकली वर्दी, कमरे में बंधक बनाने वाली 'डिजिटल सर्विलांस', और म्यूल खातों में RTGS ट्रांसफर।
  • अपराधियों पर कठोर धाराएं: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 204, 308, 318(4), 336/340, आईटी एक्ट की धारा 66C/66D और PMLA के तहत गैर-जमानती अपराध।
  • आपातकालीन सुरक्षा प्रोटोकॉल: 'रुको-सोचो-कार्रवाई करो' (Stop, Think, Act); फ्रॉड होने पर तुरंत 1930 डायल करें और cybercrime.gov.in पर गोल्डन ऑवर में रिपोर्ट दर्ज करें।
थिंक इंडिया न्यूज़ प्रेस | विशेष साइबर अन्वेषण: गृह मंत्रालय (I4C) व साइबर सेल परामर्श

नई दिल्ली — 'डिजिटल अरेस्ट' (Digital Arrest) आधुनिक साइबर अपराधियों द्वारा संचालित एक संगठित मनोवैज्ञानिक और तकनीकी ब्लैकमेलिंग सिंडिकेट है, जिसके जरिए खुद को पुलिस, सीबीआई (CBI), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), प्रवर्तन निदेशालय (ED) या सीमा शुल्क (Customs) अधिकारी बताकर नागरिकों से करोड़ों रुपये की उगाही की जा रही है। गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के अनुसार, यह कोई तकनीकी हैकिंग नहीं बल्कि परिष्कृत 'सोशल इंजीनियरिंग' और 'साइकोलॉजिकल किडनैपिंग' का मिलाजुला स्वरूप है।

1. तकनीकी कार्यप्रणाली: ठगी का चरणबद्ध चक्रव्यूह (Modus Operandi)

अपराधी किसी भी सामान्य नागरिक को मानसिक रूप से असहाय करने के लिए चार सुनियोजित चरणों में जाल बिछाते हैं:

                  'डिजिटल अरेस्ट' का आपराधिक चक्रव्यूह
                                   │
      ┌────────────────────────────┴────────────────────────────┐
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[चरण 1: प्रलोभन व भय]                                    [चरण 2: फर्जी डिजिटल कोर्ट]
आईवीआर (IVR)/कूरियर कॉल                                  स्काइप/व्हाट्सएप वीडियो कॉल
(ड्रग्स, मनी लॉन्ड्रिंग)                                 (पुलिस वर्दी, लोगो, जाली वारंट व सील)
      │                                                         │
      └────────────────────────────┬────────────────────────────┘
                                   ▼
      ┌────────────────────────────┴────────────────────────────┐
      ▼                                                         ▼
[चरण 3: मनोवैज्ञानिक बंधक]                               [चरण 4: वित्तीय निकासी]
'डिजिटल सर्विलांस' के नाम                                'आरबीआई वेरिफिकेशन' के नाम
पर कमरे में कैद रखना (कैमरा ऑन)                           पर म्यूल खातों में RTGS ट्रांसफर
  • चरण 1: संपर्क और प्रारंभिक भय का संचार — पीड़ित को एक स्वचालित इंटरेक्टिव वॉयस रिस्पॉन्स (IVR) कॉल आती है, जिसमें दावा किया जाता है कि वह दूरसंचार विभाग (DoT), ट्राई (TRAI) या कूरियर कंपनी (FedEx/DHL) से बोल रहे हैं। पीड़ित से कहा जाता है कि उसके आधार नंबर से जारी सिम कार्ड या उसके नाम से ताइवान/कंबोडिया भेजे गए पार्सल में अवैध पासपोर्ट, क्रेडिट कार्ड और एमडीएमए (MDMA) जैसी सिंथेटिक ड्रग्स पकड़ी गई हैं।
  • चरण 2: फर्जी पुलिस स्टेशन और डिजिटल जांच का मंचन — कॉल को तुरंत 'क्राइम ब्रांच' या 'सीबीआई मुख्यालय' के नाम पर ट्रांसफर कर दिया जाता है। पीड़ित को स्काइप (Skype), टेलीग्राम या व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल पर आने को मजबूर किया जाता है। कॉल के बैकग्राउंड में वास्तविक दिखने वाले पुलिस बैरिकेड्स, राष्ट्रीय प्रतीक और वायरलेस सेट की आवाजें होती हैं। वर्दी पहने ठग बैठते हैं, जिनके कंधों पर स्टार, नेम-प्लेट और आधिकारिक बैज लगे होते हैं। पीड़ित के व्हाट्सएप या ईमेल पर सुप्रीम कोर्ट के फर्जी 'अरेस्ट वारंट', ईडी के 'फ्रीजिंग ऑर्डर्स' और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के 'सीक्रेसी बॉन्ड' भेजे जाते हैं।
  • चरण 3: 'डिजिटल सर्विलांस' और अलगाव (Isolation) — ठग पीड़ित को आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official Secrets Act) की दुहाई देकर धमकाते हैं कि यह एक "राष्ट्रीय सुरक्षा का संवेदनशील मामला" है। यदि उन्होंने अपने परिजनों, दोस्तों या स्थानीय पुलिस को बताया, तो पूरे परिवार को जेल भेज दिया जाएगा। पीड़ित को 24 से 72 घंटों तक कमरे में बंद रहने, वीडियो कैमरा हर समय चालू रखने और स्क्रीन के सामने बैठने के लिए विवश किया जाता है—इसी स्थिति को ठग "डिजिटल अरेस्ट" का नाम देते हैं।
  • चरण 4: संपत्तियों का वित्तीय हस्तांतरण — जब पीड़ित पूरी तरह भयभीत और मानसिक रूप से टूट जाता है, तो उसे एक 'समाधान' दिया जाता है। ठग दावा करते हैं कि उसके बैंक खातों की जांच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा की जानी है ताकि यह प्रमाणित हो सके कि उसका धन "नारकोटिक्स या मनी लॉन्ड्रिंग" का नहीं है। इसके बाद पीड़ित से उसके सारे फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), म्यूचुअल फंड तुड़वाकर और बचत खातों का पैसा तथाकथित "सरकारी सुरक्षा खाते" में आरटीजीएस (RTGS/IMPS) के माध्यम से ट्रांसफर करवा लिया जाता है।

2. विधिक स्थिति: क्या भारतीय कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' का कोई अस्तित्व है?

स्पष्ट विधिक स्थिति: भारतीय कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसा कोई प्रावधान या विधिक शब्द अस्तित्व में नहीं है। किसी भी जांच एजेंसी, पुलिस या अदालत के पास वीडियो कॉल के जरिए किसी नागरिक को 'डिजिटल रूप से गिरफ्तार' करने या बंधक बनाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
विधिक पहलू वास्तविक कानूनी प्रक्रिया (BNSS) 'डिजिटल अरेस्ट' फ्रॉड का छलावा
गिरफ्तारी का तरीका पुलिस अधिकारी को प्रत्यक्ष उपस्थित होना होगा; धारा 35 BNSS के तहत गिरफ्तारी का लिखित मेमो और पहचान अनिवार्य है। स्काइप या व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर खुद को बंद रखने का आदेश देना।
परिजनों को सूचना गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के परिजन को तुरंत लिखित सूचना देना पुलिस की कानूनी बाध्यता है (धारा 36 BNSS)। "राष्ट्रीय सुरक्षा" का हवाला देकर परिजनों से बात करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना।
मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रत्यक्ष शारीरिक पेशी अनिवार्य है (धारा 58 BNSS)। वीडियो कॉल पर ही 'फर्जी वर्चुअल कोर्ट' लगाकर फैसला सुनाना।
खातों का सत्यापन बैंक खाते फ्रीज करने के लिए लिखित विधिक आदेश बैंक को भेजा जाता है; कभी निजी खाते में पैसा नहीं मांगा जाता। किसी अन्य व्यक्ति के चालू/बचत खाते में जांच के नाम पर पैसा ट्रांसफर करवाना।

अपराधियों पर लागू होने वाले कानूनी प्रावधान

ऐसे ठगों के विरुद्ध निम्नलिखित कानूनों के तहत गैर-जमानती और कठोर आपराधिक मामले दर्ज किए जाते हैं:

  • भारतीय न्याय संहिता (BNS):
    • धारा 204: लोक सेवक का प्रतिरूपण करना (Impersonating a public servant)।
    • धारा 308: जबरन वसूली (Extortion)।
    • धारा 318(4): धोखाधड़ी और बेईमानी से संपत्ति सौंपने के लिए प्रेरित करना (Cheating)।
    • धारा 336/340: जाली दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तैयार करना (Forgery of official documents)।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000:
    • धारा 66C: पहचान की चोरी (Identity theft)।
    • धारा 66D: कंप्यूटर संसाधन के माध्यम से प्रतिरूपण कर धोखाधड़ी करना।
  • धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA): बैंक खातों (Mule Accounts) के जरिए अवैध धन की लॉन्ड्रिंग के लिए।

3. आम नागरिकों के लिए बचाव के उपाय (SOP & Safety Measures)

गृह मंत्रालय और कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने नागरिकों की सुरक्षा के लिए 'रुको - सोचो - कार्रवाई करो' (Stop, Think, Act) का सुरक्षा प्रोटोकॉल जारी किया है:

                  नागरिक सुरक्षा प्रोटोकॉल
                             │
      ┌──────────────────────┼──────────────────────┐
      ▼                      ▼                      ▼
  रुको (Stop)           सोचो (Think)          कार्रवाई करो (Act)
कॉल काटें, किसी      क्या कोई सरकारी एजेंसी   तुरंत 1930 पर कॉल करें
दबाव में आकर वीडियो  वीडियो कॉल पर वारंट      या cybercrime.gov.in
कॉल शुरू न करें।     भेजकर पैसे मांगती है?    पर रिपोर्ट दर्ज करें।
क्या करें (Do's)
  • कॉल तुरंत डिस्कनेक्ट करें: यदि कोई कॉलर खुद को पुलिस, सीबीआई, नारकोटिक्स या ट्राई का अधिकारी बताकर डराए, तो घबराए बिना तुरंत फोन काट दें।
  • स्थानीय थाने से पुष्टि करें: यदि कॉलर दावा करता है कि आपके विरुद्ध कोई वारंट जारी हुआ है, तो नजदीकी पुलिस स्टेशन जाकर व्यक्तिगत रूप से इसकी पुष्टि करें।
  • सरकारी पहचान की जांच: ध्यान रखें कि सरकारी एजेंसियाँ केवल आधिकारिक पते पर डाक या पुलिसकर्मियों के माध्यम से भौतिक समन जारी करती हैं, व्हाट्सएप या स्काइप पर नहीं।
  • गोपनीयता साझा न करें: अपना आधार नंबर, पैन कार्ड, बैंक खाता विवरण, या बैंक में पंजीकृत मोबाइल नंबर किसी भी अज्ञात कॉलर के साथ साझा न करें।
क्या न करें (Don'ts)
  • कभी कोई फंड ट्रांसफर न करें: आरबीआई, सीबीआई या पुलिस कभी भी "सत्यापन", "टैक्स क्लियरेंस" या "सुरक्षा डिपॉजिट" के नाम पर किसी खाते में पैसा ट्रांसफर करने को नहीं कहती।
  • कैमरा ऑन करके कमरे में बंद न हों: किसी भी अज्ञात व्यक्ति के आदेश पर खुद को कमरे में अलग-थलग न करें। यह अपराधी द्वारा सोचने-समझने की शक्ति को कुंद करने की चाल होती है।
  • अज्ञात एपीके या रिमोट ऐप इंस्टॉल न करें: कॉलर के कहने पर AnyDesk, TeamViewer या कोई संदिग्ध मोबाइल एप्लिकेशन इंस्टॉल न करें।

4. यदि धोखाधड़ी हो चुकी हो, तो तत्काल उठाए जाने वाले आपातकालीन कदम

यदि आप या आपके किसी परिचित के साथ ऐसा फ्रॉड घटित हो चुका है और रकम ट्रांसफर हो चुकी है, तो पहले 2 से 3 घंटे अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं, जिसे साइबर सुरक्षा में 'गोल्डन ऑवर' (Golden Hour) कहा जाता है।

  1. तत्काल 1930 डायल करें: राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर तुरंत कॉल करें। यह हेल्पलाइन सीधे बैंकों के नोडल अधिकारियों से जुड़ी होती है। यदि पैसा अपराधी के खाते से नहीं निकला है, तो बैंक उस लेन-देन को बीच में ही फ्रीज कर देता है।
  2. राष्ट्रीय पोर्टल पर शिकायत: cybercrime.gov.in पर जाकर 'Report Financial Fraud' श्रेणी में संपूर्ण विवरण (ट्रांजैक्शन आईडी, बैंक स्टेटमेंट, कॉलर का मोबाइल नंबर, स्काइप आईडी और स्क्रीनशॉट) के साथ शिकायत दर्ज करें।
  3. बैंक को लिखित सूचना: जिस बैंक से पैसा कटा है, उसकी गृह शाखा (Home Branch) में तुरंत जाकर प्रबंधक को लिखित में अनधिकृत लेन-देन की सूचना दें और अपने डेबिट/क्रेडिट कार्ड तथा नेट बैंकिंग को ब्लॉक करवाएं।
  4. स्थानीय साइबर सेल में एफआईआर: घटना से संबंधित सभी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (कॉल रिकॉर्डिंग, चैट, जाली वारंट की पीडीएफ) का प्रिंट लेकर स्थानीय पुलिस स्टेशन या जिले के साइबर क्राइम थाने में औपचारिक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराएं।
'डिजिटल अरेस्ट' का पूरा तंत्र केवल नागरिक के मन में उपजे भय और संस्थागत अनभिज्ञता पर टिका होता है। यह स्पष्ट स्मरण रखें कि भारत का संविधान और कानून किसी भी नागरिक को कैमरे के सामने बंधक बनाने की अनुमति किसी एजेंसी को नहीं देता; ऐसा करने वाला हर व्यक्ति एक अपराधी है जिसे तुरंत पुलिस और साइबर सेल के हवाले किया जाना चाहिए।
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Frequently Asked Questions (FAQ)

क्या भारतीय कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' (Digital Arrest) का कोई कानूनी प्रावधान है?

नहीं, भारतीय कानून (BNSS या BNS) में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसा कोई प्रावधान नहीं है। किसी भी पुलिस, सीबीआई या जांच एजेंसी को वीडियो कॉल पर किसी नागरिक को बंधक बनाने या गिरफ्तार करने का कोई विधिक अधिकार नहीं है।

यदि डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में बैंक से पैसा कट जाए तो सबसे पहले क्या करें?

घटना के तुरंत बाद राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराएं, ताकि बैंक अपराधी के खाते में ट्रांसफर हुई रकम को फ्रीज कर सके।

क्या कोई सरकारी जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर बैंक खातों की जांच या पैसा ट्रांसफर करने को कहती है?

बिल्कुल नहीं। आरबीआई, सीबीआई, ईडी या पुलिस कभी भी किसी नागरिक से 'वेरिफिकेशन' या 'सुरक्षा खाते' के नाम पर किसी भी खाते में पैसा ट्रांसफर करने को नहीं कहती।

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