गढ़वा-अंबिकापुर एनएच-343 पर पिछले एक महीने में सड़क हादसों में 15% की बढ़ोतरी हुई है। जर्जर सड़क, सड़क सुरक्षा मानकों की अनदेखी और भारी वाहनों की अनियंत्रित गति ने इस मार्ग को 'डेथ ट्रैप' में बदल दिया है। हमारी विशेष खोजी रिपोर्ट।
गढ़वा-अंबिकापुर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-343) इन दिनों मौत का पर्याय बन चुका है। पिछले कुछ हफ्तों में इस मार्ग पर हुए हादसों की भयावहता ने प्रशासन की सड़क सुरक्षा व्यवस्था की कलई खोलकर रख दी है। जिला मुख्यालय से लेकर उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा तक फैले इस राजमार्ग पर हर मोड़ पर खतरा मंडरा रहा है। एनआर डेली न्यूज़ की विशेष टीम ने इस मार्ग के विभिन्न दुर्घटना संभावित क्षेत्रों (ब्लैक स्पॉट्स) का दौरा किया और पाया कि स्थिति सरकारी दावों से बिल्कुल उलट है।
घटना का बैकग्राउंड:
शनिवार की शाम रंका मोड़ के पास हुए भीषण हादसे में एक ही परिवार के तीन लोगों की जान चली गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, एक अनियंत्रित हाइवा ने पीछे से उनकी मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी थी। यह कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले 30 दिनों के आंकड़ों को देखें तो इस मार्ग पर करीब 24 बड़ी छोटी दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें 8 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और 15 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं।
जर्जर सड़क और डार्क स्पॉट्स:
NH-343 पर कई जगह ऐसे गड्ढे हैं जो किसी छोटे तालाब से कम नहीं लगते। रंका, चिनिया और डंडई की ओर जाने वाली सड़कों के मिलन बिंदु पर सड़क की स्थिति सबसे खराब है। रात के समय लाइटिंग की व्यवस्था न होने के कारण ये गड्ढे जानलेवा साबित होते हैं। स्थानीय निवासी राम सुरेश पासवान बताते हैं, "हम पिछले दो साल से सड़क मरम्मत की मांग कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन केवल धूल उड़ाने वाली पैच-रिपेयरिंग करता है। पहली बारिश में ही पुरानी स्थिति वापस आ जाती है।"
बेलगाम रफ्तार और भारी वाहन:
इस राजमार्ग पर छत्तीसगढ़ की ओर से आने वाले कोयला और पत्थर लदे ट्रकों की संख्या भारी मात्रा में है। रात के समय ये ट्रक 80 से 100 किमी की रफ्तार से दौड़ते हैं। ट्रैफिक पुलिस की तैनाती केवल बड़े चौराहों तक सीमित है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में कोई चेकिंग नहीं होती। स्पीड रडार और ओवरस्पीडिंग के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है।
प्रशासनिक उदासीनता का आलम:
सड़क सुरक्षा समिति की बैठकों में हर महीने "ब्लैक स्पॉट्स" चिन्हित किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर न तो संकेतक (Signage) लगाए गए हैं और न ही डिसाइडर। एनएचएआई के अधिकारियों का कहना है कि बजट की कमी के कारण काम रुका हुआ है, जबकि गढ़वा डीसी ने मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच कमेटी बनाने की बात कही है।
निष्कर्ष:
अगर जल्द ही सड़क की मरम्मत नहीं की गई और भारी वाहनों की गति पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो मौतों का यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। आम जनता अब सड़क पर उतरने को तैयार है। क्या प्रशासन किसी और बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है? यह सवाल आज हर गढ़वा वासी पूछ रहा है। एनआर डेली न्यूज़ इस मुद्दे पर लगातार नज़र बनाए रखेगा और जब तक ठोस कार्रवाई नहीं होती, हम जवाब मांगते रहेंगे।
