भंडरिया और बड़गड़ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में करोड़ों की लागत से बने राजकीय स्कूल अब सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। शिक्षकों की कमी और बिजली-पानी की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण बच्चे पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं।
गढ़वा के सुदूरवर्ती और कभी नक्सल प्रभावित रहे इलाकों में बुनियादी शिक्षा की बुनियाद ही डगमगा रही है। सरकार ने इन इलाकों में आलीशान 'मॉडल स्कूल' की इमारतें तो खड़ी कर दीं, लेकिन उन कमरों में ज्ञान की रोशनी पहुँचाने वाले गुरुजी गायब हैं। एनआर डेली न्यूज़ की टीम ने भंडरिया प्रखंड के आधा दर्जन स्कूलों का दौरा किया, जहां शिक्षा व्यवस्था 'भगवान भरोसे' नज़र आई।
शिक्षकों की किल्लत:
भंडरिया के उत्क्रमित मध्य विद्यालय में 200 छात्र नामांकित हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए केवल एक स्थायी शिक्षक है। बाकी का काम पारा शिक्षकों (Para Teachers) के भरोसे चल रहा है, जो खुद अक्सर हड़ताल या अन्य ड्यूटी पर रहते हैं। "साहब, मेरे बच्चों को किताब के नाम पर केवल खिचड़ी (मिड-डे मील) मिल रही है। क्या खिचड़ी खाने से मेरा बेटा अफ़सर बनेगा?"—यह सवाल एक ग्रामीण अभिभावक महादेव उरांव का है, जिसका जवाब किसी के पास नहीं।
सुविधाओं का अभाव:
करोड़ों की बिल्डिंग में न तो शौचालय काम कर रहा है और न ही पीने के पानी की व्यवस्था है। डिजिटल इंडिया के ज़माने में इन स्कूलों में कंप्यूटर तो भेजे गए, लेकिन बिजली कनेक्शन न होने के कारण वे डब्बों में बंद पड़े-पड़े खराब हो रहे हैं। कई स्कूलों में तो बच्चे ज़मीन पर बैठकर परीक्षा देने को मजबूर हैं।
मिड-डे मील का स्कैम:
जांच के दौरान कई स्कूलों में मध्याह्न भोजन (Mid Day Meal) की गुणवत्ता भी बेहद खराब मिली। दाल के नाम पर केवल पीला पानी और सड़ी हुई सब्जियां परोसी जा रही थीं। रसोइया का कहना है कि सामान समय पर नहीं पहुँचता, इसलिए जो मिलता है वही बनाना पड़ता है। इस योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार ने बच्चों के पोषण को खतरे में डाल दिया है।
प्रशासन और शिक्षा विभाग:
ज़िला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) का कहना है कि रिक्त पदों पर बहाली की प्रक्रिया राज्य स्तर से होनी है, जिसे लेकर वे लाचार हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रतिनियुक्ति (Deputation) के ज़रिए शिक्षकों को व्यवस्थित किया जा सकता था, जो नहीं हुआ।
निष्कर्ष:
अगर इन क्षेत्रों में शिक्षा की यही स्थिति रही, तो विकास की किरण कभी नहीं पहुँचेगी। नक्सलवाद से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार बंदूक नहीं, बल्कि शिक्षा है। एनआर डेली न्यूज़ मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री से पुरज़ोर अपील करता है कि वे गढ़वा के इन सुदूर स्कूलों की तरफ ध्यान दें। बिल्डिंग बनाने से ज़्यादा ज़रूरी बच्चों का भविष्य बनाना है।
