यौन शिक्षा और सहमति: अब भी एक वर्जित सच
नई दिल्ली। देश में यौन शिक्षा को लेकर बहस थमने का नाम नहीं ले रही है, लेकिन इस बीच युवाओं के लिए ‘सहमति’ यानी कंसेंट शब्द को समझना पहले से कहीं अधि...
नई दिल्ली। देश में यौन शिक्षा को लेकर बहस थमने का नाम नहीं ले रही है, लेकिन इस बीच युवाओं के लिए ‘सहमति’ यानी कंसेंट शब्द को समझना पहले से कहीं अधिक ज़रूरी हो गया है। हाल ही में हुए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग के केवल 34 प्रतिशत युवा ही यौन सहमति का सही अर्थ बता सके। यह आंकड़ा हमारी शिक्षा व्यवस्था और पारिवारिक संवाद की खामियों को उजागर करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सहमति महज़ ‘हां’ या ‘ना’ का खेल नहीं है। यह एक सतत प्रक्रिया है जिसे किसी भी समय वापस लिया जा सकता है। मनोचिकित्सक डॉ. अंजलि शर्मा बताती हैं, “सहमति स्वतंत्र, उत्साहपूर्ण और स्पष्ट होनी चाहिए। शराब या नशे की हालत में दी गई सहमति कानूनी और नैतिक रूप से अमान्य है। साथ ही, कपड़ों, पूर्व के संबंधों या फ्लर्टिंग से सहमति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।”
स्कूलों में यौन शिक्षा को लेकर कई राज्य अब भी हिचकिचाहट दिखाते हैं। मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में अभिभावकों का एक वर्ग ‘संस्कार’ और ‘पाश्चात्य संस्कृति’ का हवाला देकर पाठ्यक्रम का विरोध करता है। लेकिन दिल्ली और केरल के कुछ प्रगतिशील स्कूलों में शुरू किए गए ‘सेफ टच-अनसेफ टच’ और ‘डिजिटल कंसेंट’ के पायलट प्रोजेक्ट के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। बच्चे न केवल गुड टच-बैड टच समझ पा रहे हैं, बल्कि अपने साथियों की भावनाओं और सीमाओं का भी सम्मान करने लगे हैं।
कानूनी परिदृश्य पर नज़र डालें तो भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत विवाह में भी पत्नी की सहमति के बिना शारीरिक संबंध को वैवाहिक बलात्कार के दायरे में लाने की मांग तेज़ हुई है, हालांकि इस पर सरकार का रुख अब भी अस्पष्ट है। दूसरी ओर, डेटिंग एप और सोशल मीडिया के युग में ‘सेक्सटिंग’ और निजी तस्वीरें साझा करने से पहले डिजिटल सहमति की अवधारणा ने भी जन्म लिया है। साइबर विशेषज्ञ बताते हैं कि सहमति से भेजी गई सामग्री को बिना अनुमति वायरल करना कानूनन अपराध है, फिर भी ब्लैकमेल के मामले बढ़ते जा रहे हैं।
समाधान क्या है? विशेषज्ञ एकमत हैं कि यह शिक्षा माता-पिता से शुरू होनी चाहिए। परिवार में खुले संवाद का माहौल, बच्चे के सवालों को नज़रअंदाज़ करने के बजाय उम्र के अनुसार जवाब देना और ‘शर्म’ की जगह ‘सुरक्षा’ पर बात करना ही सही मार्ग है। जब तक हम सहमति को हर रिश्ते की बुनियाद नहीं बनाएंगे, तब तक सड़कों से लेकर शयनकक्ष तक सुरक्षित माहौल का सपना अधूरा ही रहेगा।

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