यौन हिंसा से उबरना: पीड़ित का मानसिक पुनर्वास
दिल्ली। यौन उत्पीड़न की हर खबर के बाद बहसें गर्म होती हैं, कानून सख्त होते हैं, लेकिन पीड़ितों के दीर्घकालिक मानसिक स्वास्थ्य और यौन पुनर्वास का मु...
दिल्ली। यौन उत्पीड़न की हर खबर के बाद बहसें गर्म होती हैं, कानून सख्त होते हैं, लेकिन पीड़ितों के दीर्घकालिक मानसिक स्वास्थ्य और यौन पुनर्वास का मुद्दा अक्सर सुर्खियों से गायब रहता है। ट्रॉमा काउंसलर डॉ. शोभना कहती हैं, “रेप और यौन हिंसा के शिकार व्यक्ति को सिर्फ न्याय नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और अपने शरीर पर पुनः नियंत्रण की आवश्यकता होती है।”
पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से लेकर वेजिनिस्मस और सेक्शुअल एनहेडोनिया (आनंद महसूस न कर पाना) तक, मनोवैज्ञानिक घाव शारीरिक बीमारियों में बदल सकते हैं। हैरानी की बात यह है कि देश में अधिकतर सरकारी अस्पतालों में पीड़ितों के लिए दीर्घकालिक यौन और मानसिक स्वास्थ्य परामर्श की कोई व्यवस्था नहीं है। वन स्टॉप सेंटर योजनाएं महिलाओं की तत्काल मदद तो करती हैं, लेकिन महीनों बाद उभरने वाली समस्याओं से निपटने का कोई ढांचा नहीं है।
समाज का रवैया भी एक बड़ी बाधा है। “तेरे साथ ऐसा हुआ, इसलिए तू अब अधूरी है”, यह विचार पीड़िता के उपचार की राह को और कठिन करता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी पीड़ित के साथ पुनः स्वस्थ यौन संबंध बनाने के लिए साथी का धैर्य, सहमति का पूर्ण सम्मान और प्रोफेशनल थेरेपी का त्रिकोण ज़रूरी है। “सर्वाइवर” पहचान अपनाना और साथी के साथ फिर से सेफ स्पेस बनाना एक लंबी और संभव प्रक्रिया है।

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