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इंसानियत को झकझोर देने वाला तमाशा: गढ़वा के रमना में जातिवाद की भेंट चढ़ता 4 साल का प्यार, और माता-पिता का दोहरा रवैया

गढ़वा (रमना): समाज में 'लड़की को लक्ष्मी' कहने का दिखावा कैसे किया जाता है और झूठी शान के लिए उसी बेटी की खुशियों और इज्जत का कैसे गला घोंटा जाता है, इसका जीता-जागता मामला गढ़वा के रमना से सामने आया है।

ByThinkIndia.press Bureau
Published On 4 मई 2026
इंसानियत को झकझोर देने वाला तमाशा: गढ़वा के रमना में जातिवाद की भेंट चढ़ता 4 साल का प्यार, और माता-पिता का दोहरा रवैया
Representative Image [ThinkIndia.press Bureau]

गढ़वा (रमना): समाज में 'लड़की को लक्ष्मी' कहने का दिखावा कैसे किया जाता है और झूठी शान के लिए उसी बेटी की खुशियों और इज्जत का कैसे गला घोंटा जाता है, इसका जीता-जागता और इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला गढ़वा के रमना से सामने आया है। यह कहानी स्नेहा गुप्ता और रूपेश विश्वकर्मा की है, जिनका 4 साल का गहरा प्यार सिर्फ इसलिए सूली पर चढ़ाया जा रहा है क्योंकि दोनों की 'जाति' अलग है।

प्यार, एक-दूसरे के लिए समर्पण, और भगवान से किया गया सवाल

स्नेहा और रूपेश का रिश्ता कोई साधारण आकर्षण नहीं है। पिछले 4 सालों से साथ रहने वाली स्नेहा, रूपेश को अपना पति मानती है — इस बात का खुलासा तब हुआ जब एक्सीडेंट के बाद हमने उसका फोन चेक किया। उसे पाने के लिए स्नेहा ने न सिर्फ भगवान शिव का '16 सोमवार' का व्रत किया, बल्कि पिछले 1 साल से भी ज्यादा समय से वह भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए 'गुरुवार का कठिन उपवास' भी कर रही है। वहीं, रूपेश भी पीछे नहीं था, उसने भी स्नेहा को अपना जीवनसाथी बनाने के लिए 1 साल तक भगवान विष्णु का कड़ा उपवास किया। जब भगवान से मन्नतें पूरी होती नहीं दिखीं, तो हारकर स्नेहा ने टूटते हुए कहा— "इस जन्म में आप हमें नहीं मिले, भगवान का हमने क्या बिगाड़ा था?" इसी मानसिक दबाव और परिवार के रवैये के कारण स्नेहा ने फांसी लगाकर जान देने तक की कोशिश की थी।

पटना में सेवा से लेकर भागने की ज़िद तक

यह वही स्नेहा है जिसने एक बार रूपेश की तबीयत खराब होने पर, उसे पटना से बुलाकर अपने पास रखा था और उसकी सेवा-पानी की। उसे कोचिंग कराई, कंप्यूटर सिखाया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सीखने के लिए भी प्रेरित किया था। वह खुद अपने हाथों से खाना बनाकर उसे खिलाती थी। मजबूरी के इस भंवर में फंसी स्नेहा ने बहुत बार रूपेश से भाग जाने की जिद की। लेकिन रूपेश अपनी बात पर अड़ा रहा और उसने साफ इनकार कर दिया। रूपेश का कहना था कि "शादी होगी तो घरवालों की मंजूरी और उनके आशीर्वाद से ही होगी।" रूपेश सिर्फ इसी वजह से उसके घरवालों से बात करने गया था।

29 अप्रैल का दिन: पिता का जातिवाद और लौटते समय भयानक एक्सीडेंट

पहली बार वह रास्ता पूछते-पूछते गया, लेकिन उसे कुछ पता नहीं था और तबीयत खराब होने के कारण वह लौट आया। जब वह दूसरी बार गया, तो सम्मान में वह घर तक तो गया, लेकिन घर से मुड़कर वापस आ गया क्योंकि स्नेहा ने कहा था कि "मैं मिलने आऊंगी आपसे।" आखिरकार 29 अप्रैल 2026 को रूपेश तीसरी बार खुद स्नेहा के घर गया। इत्तेफाक से स्नेहा उस दिन उससे मिलने गढ़वा ही आई हुई थी, जिसकी भनक रूपेश को नहीं थी और वह उसके घर पहुंच गया। जब रूपेश ने स्नेहा के पिता से बात करनी चाही, तो पिता ने सबसे पहले उसका घर पूछा और उसके बाद उसका नाम पूछा। जैसे ही नाम से पता चला कि दोनों अलग-अलग जाति के हैं, पिता ने साफ कह दिया— "चले जाइए, हमें आगे कोई बात नहीं करनी है।" हम पूरी रमना की जनता से पूछना चाहते हैं कि क्या प्यार का मतलब सिर्फ उसी दिन लौटते समय रूपेश का एक भीषण एक्सीडेंट हो गया। नौबत जीने-मरने तक आ गई।

इंसानियत का तमाशा: मौत के डर से फोन स्विच ऑफ

रूपेश के एक्सीडेंट की खबर जैसे ही स्नेहा को मिली, वह फूट-फूट कर रोने लगी। लेकिन इंसानियत का जो घिनौना तमाशा उस दिन हुआ, वो आज तक कहीं नहीं हुआ। स्नेहा के घरवालों ने उसका फोन ऑफ करवा दिया और अपना फोन भी बंद कर लिया। वजह? कि कहीं वो लड़का मर गया तो पुलिस केस न हो जाए और हम सब फँस न जाएं। इंसानियत के नाते तो आपको उसके घर जाना चाहिए था, उससे बात करनी चाहिए थी, लेकिन आपने तो स्नेहा को उससे मिलने तक नहीं दिया। फोन ऑफ था, स्नेहा रोती रही और रोज उसके लिए पूजा-पाठ करती रही। इसी बीच घरवालों ने चुपके से स्नेहा का कहीं और रिश्ता लगाने की कोशिश भी की।

19 मई: परीक्षा हॉल में आंसुओं का सैलाब

19 मई को जब दोनों एक परीक्षा के दौरान दोबारा मिले, तो स्नेहा रूपेश को अपनी तरफ चलकर आते देख रो पड़ी। एग्जाम के दिनों में दोनों बस एक-दूसरे को देखकर रोते रहे। स्नेहा ने रोते हुए कहा कि पिता नहीं मान रहे हैं। उसने बताया कि "हम अभी रुके नहीं हैं, आपके लिए गुरुवार का व्रत अभी भी कर रहे हैं।" एग्जाम में जब रूपेश की तबीयत खराब हुई, तो स्नेहा उसे लगातार पानी पिलाती रही और चेक करती रही कि क्या हुआ। जब लोगों ने रूपेश की हालत पर शक किया कि यह इतना क्यों सो रहा है, तो स्नेहा ने निडर होकर सबको बताया कि "इनकी तबीयत खराब है।" वहीं के उनके जानने वालों ने आगे बताया कि दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं और शादी भी करना चाहते हैं, लेकिन अलग जाति होने की वजह से घरवाले नहीं मान रहे हैं।

समाज, माता-पिता और पाखंडी पूजा-पाठ से सीधे सवाल

आज उन घरवालों से यह पूछने का वक्त आ गया है कि क्या बेटी की इज्जत से ज्यादा बड़ी आपकी खुशी है? जिस लड़के के लिए वह तन-मन से इतना प्यार करती है, आप क्या चाहते हैं कि आप अपने झूठे प्यार और शान के लिए उसकी इज्जत दांव पर लगा दें? शर्म आनी चाहिए ऐसे माँ-बाप को जो अपनी बेटी की खुशी से पहले इस 'समाज' को रखते हैं! ये वही लोग हैं जो रोज शिव और पार्वती जी की पूजा करते हैं, शिव जी पर जल डालते हैं। क्या फायदा ऐसे पूजा-पाठ का ढोंगी बनने से? आप कहते हो कि शिव जी और पार्वती दोनों ने 'प्रेम विवाह' (लव मैरिज) की थी, लेकिन आपको अपनी बेटी का प्यार और उसकी इज्जत नजर नहीं आती。

क्या बेटी कोई बेजान वस्तु है, जिसका कोई आत्मसम्मान नहीं?

जो लोग समाज में 'बेटी तो घर की लक्ष्मी होती है' जैसे बड़े-बड़े आदर्श बघारते हैं, उनके खोखलेपन का आज पर्दाफाश हो गया है। अपनी झूठी शान और अहंकार को संतुष्ट करने के लिए ये घरवाले खुद ही अपनी बेटी के सम्मान को दांव पर लगा रहे हैं। अगर बेटियों को इसी तरह प्रताड़ित करना है, तो उन्हें जन्म ही क्यों दिया जाता है? उनके चरित्र और भावनाओं के साथ ऐसा क्रूर खिलवाड़ आखिर क्यों? यह एक घोर पाप है! एक बार उस लड़की की मानसिक स्थिति के बारे में सोचिए कि क्या बीतेगी उस पर, जब बिना उसकी मर्जी के किसी अजनबी के साथ उसे जीवन बिताने के लिए मजबूर किया जाएगा। इस समाज का क्या है? लोग शादी में आएंगे, दावत खाएंगे और चले जाएंगे। लेकिन अगर कल को उस लड़की का जीवन बर्बाद होता है या कोई अनहोनी होती है, तो यही समाज बड़ी आसानी से कह देगा कि "लड़की की किस्मत ही खराब थी।"

लड़की ने तो अपने लिए अच्छा ही जीवनसाथी चुना था। उस लड़के में आखिर क्या कमी थी? लड़के के होश में आने के बाद जब उससे पूछा गया तो वह बिना किसी डर-भय के अकेला ही शादी की बात करने गया था। जो लड़का आज तक उनके घर नहीं गया था, वह सिर्फ स्नेहा की खातिर रास्ता पूछते-पूछते वहां पहुंचा और सम्मानपूर्वक प्रणाम भी किया। अब मैं उस समाज से पूछना चाहती हूँ, अगर उसे भगाकर किसी की इज्जत उछालनी होती, तो क्या वह ऐसा नहीं कर सकता था? मैं उस समाज से यह पूछना चाहता हूँ कि क्या उस लड़की की पसंद खराब थी, या उस लड़के के संस्कार ठीक नहीं थे? क्या संस्कार सिर्फ 'जाति' से तय होते हैं? क्या किसी की जाति उसका चरित्र बता सकती है?

बेटी कोई खिलौना या सामान नहीं है

अगर आज उसकी शादी कहीं और होती है, तो उसके ऊपर एक अमिट दाग लग जाएगा और फिर लोग बोलेंगे कि "लड़की ही ठीक नहीं थी।" और ये माता-पिता अपनी झूठी शान और समाज के डर के लिए अपनी ही बेटी को लक्ष्मी कहकर उसकी इज्जत से खेलते हैं। अगर समाज बेटियों को सचमुच घर की लक्ष्मी मानता है, तो माता-पिता का भी यह कर्तव्य है कि वे उसे वह सम्मान दें जिसकी वह हकदार है। अपनी झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए बेटी की भावनाओं को कुचलना कतई सही नहीं है। बेटियां कोई बेजान वस्तु या खिलौना नहीं हैं, जिन्हें कोई भी अपने मन-मुताबिक इस्तेमाल कर ले। अब वक्त आ गया है कि समाज और परिवार बेटियों को अपने अहंकार और स्वार्थ की बलि चढ़ाना बंद करें, और उन्हें उनके जीवन के फैसले लेने का पूरा सम्मान और अधिकार दें।

मैं आज पूरे समाज के रक्षकों से पूछना चाहती हूँ, क्या है धर्म? जिस लड़की ने किसी लड़के का हाथ एक बार थाम लिया, आप उसे हटाकर दूसरे के गले में डालना चाहते हो, क्या यह है धर्म? अगर लड़की या वह लड़का कुछ नहीं बोल रहे हैं तो समाज उनका इस्तेमाल अपने मतलब के लिए करेगा, क्या यह है धर्म? या अब जो उस लड़की के साथ खिलवाड़ होगा, वह है धर्म? अगर कोई चुप है तो क्या उसके साथ कोई गलत करेगा? हे धर्म और समाज के झूठे रक्षकों, सावधान! लड़की सिर्फ अबला नारी नहीं होती, वही किसी की बेटी, किसी की बहन, किसी की बहू, वही देवी होती है, वही लक्ष्मी है, और आप अपने मतलब के लिए जब उसकी इज्जत पर आन पड़ी है तो चुप हैं।

और माता-पिता से मेरी हाथ जोड़कर विनती है, समाज को दिखाना बंद करें कि आप अपनी बेटी की शादी अपने ही समाज (जाति) में करने की सोचते हैं, उससे पहले अपनी बेटी की इज्जत का जरूर ध्यान रखें। बेटी आपकी है, किसी और की नहीं, कि आज इसके साथ तो कल किसी और के साथ भेज दिए।

(नोट: हम समाज की ऐसी ही कड़वी सच्चाइयों और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते रहेंगे।)

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