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पहला खुलासा: हजारीबाग की प्रिंटिंग प्रेस से शुरू हुई साजिश, जहाँ छपते ही लीक हुए प्रश्नपत्र

आधी रात के घने अँधेरे में हजारीबाग के औद्योगिक क्षेत्र स्थित ‘शिव शक्ति प्रिंटर्स’ की सीढ़ियों पर पुलिस के बूटों की आवाज़ गूँजी।

ByThinkIndia Global Bureau
Published On Aug 9, 2026
पहला खुलासा: हजारीबाग की प्रिंटिंग प्रेस से शुरू हुई साजिश, जहाँ छपते ही लीक हुए प्रश्नपत्र
Representative Image [ThinkIndia Global]

Key Highlights

  • झारखंड पेपर लीक कांड पर विस्तृत और सच्ची रिपोर्टिंग।
  • दलालों, अधिकारियों और प्रिंटिंग प्रेस के बड़े गठजोड़ का खुलासा।
  • SIT की रिपोर्ट और गिरफ्तारियों पर एक्सक्लूसिव कवरेज।

रांची/हजारीबाग, 12 मार्च 2022: आधी रात के घने अँधेरे में हजारीबाग के औद्योगिक क्षेत्र स्थित ‘शिव शक्ति प्रिंटर्स’ की सीढ़ियों पर पुलिस के बूटों की आवाज़ गूँजी। इस प्रिंटिंग प्रेस के मालिक सुधीर मेहता को जब हथकड़ी लगी, तब झारखंड का सबसे बड़ा शिक्षा घोटाला अपनी पूरी नग्नता के साथ सामने आने वाला था। यह वही प्रेस थी जिसे झारखंड अधिविद्य परिषद (JAC) ने मैट्रिक और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों की छपाई का करोड़ों का ठेका दिया था। लेकिन सुरक्षा के तमाम दावों के बीच यहीं से प्रश्नपत्र बाजार में उतर रहे थे।

पुलिस को पहली सूचना एक स्थानीय छात्र ने दी थी, जिसने बताया कि व्हाट्सएप पर उसे 2000 रुपये में ‘सोशल साइंस’ का पूरा पेपर मिल सकता है। पुलिस ने जब इस नंबर को ट्रेस किया तो तार जुड़ते चले गए – व्हाट्सएप ग्रुप के एडमिन से लेकर एक छोटे दलाल तक, दलाल से शिक्षक, और शिक्षक से सीधे प्रिंटिंग प्रेस के मुंशी तक। हैरान करने वाला खुलासा यह था कि प्रश्नपत्रों की छपाई के दौरान ही कुछ कर्मचारी मोबाइल फोन से उनकी तस्वीरें खींच लेते थे। प्रेस परिसर में सीसीटीवी कैमरे तो लगे थे, लेकिन उनके एंगल को इस तरह सेट किया गया था कि जिस हिस्से में पेपर रखे जाते थे, वह ब्लाइंड स्पॉट बना रहता था।

पुलिस ने जब प्रेस पर छापा मारा, तो वहाँ से 12 बंडल प्रश्नपत्रों की मूल प्रति, 5 मोबाइल फोन, और एक डायरी बरामद हुई, जिसमें अलग-अलग जिलों के ‘ग्राहकों’ के नाम और रकम दर्ज थी। प्रिंटिंग प्रेस का मालिक बुरी तरह घबराया हुआ था। उसने पहले तो सफाई दी कि ये पुराने पेपर हैं, लेकिन जब एसपी ने उसी वक्त बोर्ड के सचिव को बुलाकर पेपर का मिलान करवाया, तो मेहता के पसीने छूट गए। ये वही प्रश्नपत्र थे जो 48 घंटे बाद परीक्षा केंद्रों पर जाने वाले थे।

गौर करने वाली बात यह थी कि प्रश्नपत्र लीक का यह तरीका कोई नया नहीं था। मेहता ने पूछताछ में स्वीकार किया कि पिछले तीन सालों से वह प्रति विषय 50-50 हजार रुपये में प्रश्नपत्रों की फोटो निकालकर बेच रहा था। हर बार बोर्ड परीक्षा के दौरान उसकी प्रेस ‘मिनी मिंट’ बन जाती थी। पेपर छपने के बाद उन्हें सीलबंद ट्रंक में बोर्ड मुख्यालय भेजने से पहले रात में ही तस्वीरें खींची जातीं और व्हाट्सएप के जरिए भेज दी जातीं। इस खेल में प्रेस का चपरासी से लेकर सुपरवाइजर तक शामिल था। हर किसी को उसकी हैसियत के हिसाब से हिस्सा मिलता था।

इस खुलासे के बाद पूरे प्रदेश में भूचाल आ गया। जिस प्रिंटिंग प्रेस पर JAC ने ‘पूर्णतः सुरक्षित’ होने का दावा किया था, वही लीक का गैंगस्टर अड्डा निकला। पुलिस ने मौके से जो लैपटॉप बरामद किया, उसमें पिछले पांच बोर्ड परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों की स्कैन की हुई कॉपियाँ मिलीं। यही नहीं, उसमें उन स्कूलों के नाम तक थे जिनके प्रिंसिपलों ने पहले ही मोटी रकम देकर प्रश्नपत्र बुक कर लिए थे। मामला केवल एक प्रिंटिंग प्रेस तक सीमित न रहा – तार सीधे बोर्ड के भीतर बैठे बाबुओं और फिर सत्ता के गलियारों तक जा पहुँचे। उस रात जब प्रिंटिंग प्रेस का शटर गिरा, तो उसके साथ झारखंड की शिक्षा व्यवस्था पर सालों से जमी चमक-दमक भी ध्वस्त हो गई।

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