शिक्षा मंत्री के OSD की भूमिका: कैसे सरकारी महकमे से ही लीक हो रहे थे प्रश्नपत्र
न्यूक्लियस स्थित मंत्रालय भवन, जहाँ से झारखंड की शिक्षा नीति बनती थी, वहीं से उसे बर्बाद करने का खेल भी चल रहा था।

Key Highlights
- झारखंड पेपर लीक कांड पर विस्तृत और सच्ची रिपोर्टिंग।
- दलालों, अधिकारियों और प्रिंटिंग प्रेस के बड़े गठजोड़ का खुलासा।
- SIT की रिपोर्ट और गिरफ्तारियों पर एक्सक्लूसिव कवरेज।
रांची, 23 मार्च 2022: न्यूक्लियस स्थित मंत्रालय भवन, जहाँ से झारखंड की शिक्षा नीति बनती थी, वहीं से उसे बर्बाद करने का खेल भी चल रहा था। OSD अनुज कुमार सिंह की रिमांड पर हुई पूछताछ ने जो राज खोले, उसने पूरे सरकारी तंत्र की पोल खोलकर रख दी। यह कहानी किसी क्राइम थ्रिलर से कम नहीं थी – जहाँ मंत्री के विश्वासपात्र ने ही अपने दफ्तर को पेपर लीक का कंट्रोल रूम बना रखा था।
पुलिस के सामने अनुज कुमार सिंह ने जो बयान दिया, उसके मुताबिक यह पूरा सिंडिकेट उसकी नियुक्ति के तीन महीने के भीतर ही सक्रिय हो गया था। उसके पास प्रश्नपत्रों के मॉडरेशन, छपाई और वितरण की पूरी फाइलें आती थीं। वह खुद JAC और प्रिंटिंग प्रेस के बीच समन्वय का काम देखता था। सिंह ने बताया कि शुरुआत में उसने केवल दो-तीन बड़े कोचिंग संस्थानों को ‘मदद’ करने की सोची थी, लेकिन जब उसे एहसास हुआ कि कोई सवाल नहीं उठा रहा है, तो उसने इसे बाकायदा बिजनेस मॉडल में बदल दिया। वह हर जिले के लिए अलग-अलग ‘डिस्ट्रीब्यूटर’ नियुक्त करता था, जिन्हें प्रति पेपर 50,000 से 2 लाख रुपये तक में प्रश्नपत्रों की पीडीएफ भेजी जाती थी।
OSD के दफ्तर से जो लैपटॉप बरामद हुआ, उसमें एक एन्क्रिप्टेड फोल्डर मिला। पुलिस की साइबर टीम ने जब इसे डिक्रिप्ट किया, तो उसमें पिछले चार सालों का पूरा हिसाब-किताब मिला। हर लेन-देन का रिकॉर्ड था – किस शहर के किस दलाल को कौन-सा पेपर, कब और कितने रुपये में दिया गया। एक खास बात यह थी कि OSD ने ‘गोल्ड कस्टमर’ और ‘सिल्वर कस्टमर’ की अलग-अलग कैटेगरी बना रखी थी। गोल्ड कस्टमर वे शहर के बड़े निजी स्कूल और कोचिंग सेंटर थे, जिन्हें परीक्षा से 48 घंटे पहले पेपर मिल जाता था, जबकि सिल्वर वालों को 12 घंटे पहले, ताकि स्क्रीनशॉट वायरल न हों।
चौंकाने वाला तथ्य यह था कि इस सिंडिकेट में OSD अकेला सरकारी अधिकारी नहीं था। उसने बोर्ड के चार अन्य अधिकारियों, दो सुरक्षाकर्मियों और एक ड्राइवर का नाम लिया, जो इस खेल में बराबर के हिस्सेदार थे। ड्राइवर का काम था सीलबंद ट्रंक को रास्ते में रोककर उसमें से असली पेपर निकालना और नकली डाल देना। इसके लिए उसे हर बार 20 हजार रुपये मिलते थे। OSD ने पूछताछ में यहाँ तक कहा कि “मंत्री जी तक को सब पता था”, लेकिन यह बयान जांच का हिस्सा बनते-बनते राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया। हालाँकि, OSD ने अपने बचाव में यह भी कहा कि वह तो केवल ‘सिस्टम का एक पुर्जा’ था, असली मास्टरमाइंड कोई और था, जो कभी सामने नहीं आता था।
इस खुलासे के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई। विपक्षी दलों ने सीधे तत्कालीन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग कर दी और सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए। शिक्षा मंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि उनका OSD दोषी है तो उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, लेकिन वे खुद पाक-साफ हैं। लेकिन जनता का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था। सोशल मीडिया पर #OSD_Exposed ट्रेंड करने लगा और एक के बाद एक कई मीम्स बने, जिनमें OSD को शिक्षा का ‘सेठ’ दिखाया जाने लगा। पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह पता लगाना था कि ओएसडी ने अपने बयान में जिस ‘असली मास्टरमाइंड’ की बात कही थी, वह आखिर कौन है और क्या वह अब भी सिस्टम में मौजूद है।
