व्हाट्सएप और सोशल मीडिया: पेपर लीक का नया जरिया, लाखों छात्रों की जिंदगी से खिलवाड़
रात के 2:47 बजे, एक किशोर की स्क्रीन पर एक व्हाट्सएप मैसेज चमका – “कल के इंग्लिश पेपर की फुल पीडीएफ, सिर्फ 500 रुपये में।

Key Highlights
- झारखंड पेपर लीक कांड पर विस्तृत और सच्ची रिपोर्टिंग।
- दलालों, अधिकारियों और प्रिंटिंग प्रेस के बड़े गठजोड़ का खुलासा।
- SIT की रिपोर्ट और गिरफ्तारियों पर एक्सक्लूसिव कवरेज।
धनबाद/देवघर, 28 मार्च 2022: रात के 2:47 बजे, एक किशोर की स्क्रीन पर एक व्हाट्सएप मैसेज चमका – “कल के इंग्लिश पेपर की फुल पीडीएफ, सिर्फ 500 रुपये में। पहले पेमेंट करो, फिर पीडीएफ।” यह कोई अपवाद नहीं था, बल्कि झारखंड पेपर लीक कांड का सबसे भयावह और व्यापक चेहरा था। सोशल मीडिया ने इस पूरे घोटाले को एक नई रफ्तार और नई पहुँच दी, जिसने पारंपरिक ‘चिट्ठी-गुपचुप’ वाले पेपर लीक को डिजिटल युग का सिंडिकेट बना दिया।
पुलिस की साइबर टीम ने जब आरोपियों से जब्त मोबाइलों की जाँच की, तो पाया कि पूरे प्रदेश में 250 से अधिक व्हाट्सएप ग्रुप्स ऐसे थे जो केवल पेपर लीक के लिए बनाए गए थे। इनमें से कुछ ग्रुप के नाम बड़े मासूम थे जैसे ‘JAC स्टूडेंट हेल्प’, ‘एग्जाम सपोर्ट 2022’, ‘दोस्तों का अड्डा’, लेकिन इनके भीतर जो चल रहा था, वह किसी गंभीर शैक्षिक धोखाधड़ी से कम नहीं था। एडमिन हर रोज शाम 7 बजे के बाद एक मैसेज भेजते – “आज का पेपर अपलोड हो गया है, जिन्होंने पेमेंट नहीं किया वे 10 मिनट में ग्रुप छोड़ दें वरना रिमूव कर दिए जाएंगे।” ये ग्रुप्स हर जिले के लिए अलग-अलग थे, और हर ग्रुप में 200-300 मेंबर होते थे, जिनमें से अधिकांश परीक्षार्थी या उनके अभिभावक थे।
पेपर लीक का धंधा करने वाले दलालों ने सोशल मीडिया को एक कुशल मार्केटिंग टूल की तरह इस्तेमाल किया। वे फेसबुक पर फर्जी आईडी बनाकर ‘JAC पेपर 100% लीक’ जैसे पोस्ट डालते, जिनमें नीचे कमेंट करने वालों को प्राइवेट मैसेज करके डील फाइनल की जाती। इंस्टाग्राम के स्टोरी फीचर का इस्तेमाल करते हुए वे प्रश्नपत्रों के स्क्रीनशॉट की छोटी-सी झलक दिखाते और फिर डीएम करने को कहते। टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म तो पूरी तरह से इस काम के लिए ‘स्वर्ग’ बन चुके थे, क्योंकि वहाँ मैसेज ऑटो-डिलीट की सुविधा थी और ग्रुप मेंबर्स की संख्या भी कहीं ज्यादा हो सकती थी।
सबसे दर्दनाक पहलू था इस पूरे खेल का छात्रों के मनोविज्ञान पर पड़ने वाला प्रभाव। जो छात्र साल भर मेहनत करते थे, वे जब देखते थे कि उनके सहपाठी चंद रुपयों में पेपर खरीदकर अच्छे नंबर लाने की फिराक में हैं, तो उनका मनोबल टूट जाता था। कई छात्रों ने बाद में पुलिस को बताया कि उन्हें भी इन ग्रुप्स में जुड़ने का दबाव महसूस होता था, क्योंकि अगर वे नहीं जुड़ते तो उन्हें डर था कि वे पीछे रह जाएंगे। धनबाद की रहने वाली एक छात्रा ने रोते हुए कहा – “हमारी पूरी क्लास में एक भी बच्चा ऐसा नहीं था जिसके फोन में कम से कम एक पेपर लीक ग्रुप न हो। हमें लगने लगा था कि ईमानदारी से पढ़ना सबसे बड़ी बेवकूफी है।”
पुलिस ने जब 23 दलालों को एक साथ गिरफ्तार किया, तो उनके पास से दो दर्जन से अधिक मोबाइल और ढेरों सिम कार्ड बरामद हुए, जो नकली आईडी पर लिए गए थे। इनमें से एक दलाल तो खुद 12वीं का छात्र था, जिसने अपने ही स्कूल के बच्चों को पेपर बेचकर लाखों रुपये कमा लिए थे। उसने बताया कि उसे यह आइडिया एक बड़े कोचिंग सर ने दिया था। सोशल मीडिया की इस काली दुनिया ने शिक्षा व्यवस्था के उस सड़ांध को उजागर किया जो सिर्फ सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि समाज के हर तबके की नैतिक गिरावट का आईना बन चुकी थी। JAC को मजबूरन परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं और साइबर एक्सपर्ट्स की एक स्पेशल टीम बनाई गई, लेकिन भरोसे की जो चादर फटी, वह अब आसानी से नहीं सिल सकती थी।
