1000-1000 रुपये में बिक रहे थे पेपर: पेपर लीक का आर्थिक खेल, दलालों का नेटवर्क
पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने जब पेपर लीक के पैसों के प्रवाह का पीछा करना शुरू किया, तो सामने आया एक बेहद संगठित और परतदार वित्तीय नेटवर्क।

Key Highlights
- झारखंड पेपर लीक कांड पर विस्तृत और सच्ची रिपोर्टिंग।
- दलालों, अधिकारियों और प्रिंटिंग प्रेस के बड़े गठजोड़ का खुलासा।
- SIT की रिपोर्ट और गिरफ्तारियों पर एक्सक्लूसिव कवरेज।
जमशेदपुर/बोकारो, 2 अप्रैल 2022: पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने जब पेपर लीक के पैसों के प्रवाह का पीछा करना शुरू किया, तो सामने आया एक बेहद संगठित और परतदार वित्तीय नेटवर्क, जो किसी माफिया रैकेट की तरह राज्य भर में फैला हुआ था। यह खेल ₹500 के नोटों से शुरू होता था और 50 लाख रुपये की हवाला डील तक जाता था। पेपर लीक का बाजार इतना बड़ा था कि कई जिलों में दलालों ने अपने-अपने ‘टेरिटरी’ बाँट रखे थे।
जाँच में पाया गया कि प्रश्नपत्रों की कीमत बिल्कुल वैसे ही तय होती थी जैसे शेयर बाजार में किसी स्टॉक की। परीक्षा से 7 दिन पहले अगर किसी को पेपर चाहिए होता था, तो उसे प्रति विषय ₹50,000 तक चुकाने पड़ते थे। परीक्षा से 24 घंटे पहले यह कीमत घटकर ₹10,000-15,000 हो जाती और परीक्षा वाली सुबह मात्र ₹1000-2000 में पीडीएफ उपलब्ध हो जाती थी। यह मूल्य निर्धारण दलालों ने बहुत ही सोच-समझकर किया था ताकि हर हैसियत का ग्राहक उनके जाल में फँस सके। ‘प्रीमियम ग्राहकों’ के लिए तो पेपर के साथ हल प्रश्नपत्र (सॉल्व्ड पेपर) भी उपलब्ध कराया जाता था, जिसकी कीमत और भी अधिक होती थी।
इस आर्थिक नेटवर्क का सबसे निचला पायदान थे स्थानीय दलाल, जो कोचिंग सेंटरों के बाहर, चाय की दुकानों पर, और यहाँ तक कि परीक्षा केंद्रों के गेट पर खड़े होकर छात्रों को टारगेट करते थे। ये दलाल अक्सर पूर्व छात्र या ड्रॉपआउट होते थे, जिनकी स्थानीय भाषा और लहजा छात्रों को विश्वास दिलाने में कारगर साबित होता था। इनसे ऊपर थे ‘एरिया मैनेजर’, जो 4-5 स्कूलों के दलालों से कमीशन लेते और ऊपर के स्तर तक पैसा पहुँचाते थे। सबसे ऊपर थे ‘मास्टर डिस्ट्रीब्यूटर’ – ये वे लोग थे जिनका सीधा संपर्क बोर्ड या प्रिंटिंग प्रेस के अंदरूनी सूत्रों से था।
पैसे का लेन-देन अधिकतर कैश या हवाला के जरिए होता था ताकि कोई बैंक ट्रेल न छूटे। कई मामलों में तो छोटे-मोटे लेन-देन के लिए पेटीएम, गूगल पे और फोनपे का इस्तेमाल हुआ था, लेकिन उसके लिए भी नकली आईडी से बनाए गए एकाउंट्स का प्रयोग होता था। पुलिस ने जब पिछले तीन वर्षों के हवाला ट्रांजेक्शन का विश्लेषण किया तो अनुमान लगाया कि इस पूरे सिंडिकेट का सालाना टर्नओवर 15-20 करोड़ रुपये के बीच था। यह राशि केवल JAC बोर्ड तक सीमित नहीं थी, बल्कि कई प्रतियोगी परीक्षाओं और राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षाओं तक में इसी तरह के पैसे का खेल सामने आया।
दलालों के बैंक लॉकरों और घरों से जब नोटों की गड्डियाँ बरामद हुईं, तो उनमें 2000 के नोटों की भरमार थी – यह बताने के लिए काफी था कि पेपर लीक का व्यवसाय किस हद तक फल-फूल रहा था। आर्थिक शाखा की रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह था कि इस अवैध कमाई का एक हिस्सा स्थानीय जनप्रतिनिधियों के चुनावी खर्च और बेनामी प्रॉपर्टी में भी निवेश किया गया था। पेपर लीक अब केवल एक शैक्षणिक अपराध नहीं रह गया था, यह संगठित अपराध का वह रूप बन चुका था, जो प्रदेश की जड़ों तक अपनी जहरीली शाखाएँ फैला चुका था।
