TRENDING NEWS
Home>News>jharkhand

छात्रों का आक्रोश: सड़कों पर उतरे बच्चे, जलाए टायर, फूंका सरकार का पुतला

सुबह की पहली किरण के साथ ही रांची का अल्बर्ट एक्का चौक नारेबाजी से गूँज उठा। हजारों की संख्या में छात्र सड़कों पर उतर आए।

ByThinkIndia Global Bureau
Published On Aug 9, 2026
छात्रों का आक्रोश: सड़कों पर उतरे बच्चे, जलाए टायर, फूंका सरकार का पुतला
Representative Image [ThinkIndia Global]

Key Highlights

  • झारखंड पेपर लीक कांड पर विस्तृत और सच्ची रिपोर्टिंग।
  • दलालों, अधिकारियों और प्रिंटिंग प्रेस के बड़े गठजोड़ का खुलासा।
  • SIT की रिपोर्ट और गिरफ्तारियों पर एक्सक्लूसिव कवरेज।

रांची, 5 अप्रैल 2022: सुबह की पहली किरण के साथ ही रांची का अल्बर्ट एक्का चौक नारेबाजी से गूँज उठा। हजारों की संख्या में मैट्रिक और इंटर के छात्र, जिनकी आँखों में आँसू और हाथों में तख्तियाँ थीं, सड़कों पर उतर आए थे। पेपर लीक की वजह से बार-बार रद्द होती परीक्षाओं और अनिश्चित भविष्य से तंग आकर इन बच्चों का आक्रोश ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा। यह कोई सामान्य प्रदर्शन नहीं था; यह उस पीढ़ी की चीख थी जिसका सपनों का बुनियादी ढाँचा ढहा दिया गया था।

प्रदर्शन की शुरुआत रांची के मोरहाबादी मैदान से हुई, जहाँ पहले 500-600 छात्र जमा हुए। लेकिन जैसे-जैसे खबर सोशल मीडिया पर फैली, संख्या बढ़ती गई और देखते ही देखते 10,000 से अधिक छात्रों का हुजूम राजभवन की ओर कूच करने लगा। हाथों में लिखी तख्तियों पर लिखा था – “हमने पेपर नहीं खरीदा, तो क्या हमें सजा मिलेगी?”, “शिक्षा माफिया को फाँसी दो”, “हमारा एक साल बर्बाद, जवाब दो सरकार”। छात्रों ने जब पुलिस बैरिकेड्स को तोड़ने की कोशिश की, तो स्थिति बेकाबू हो गई।

राजभवन के पास छात्रों ने टायर जलाए, जिससे पूरा इलाका काले धुएँ से भर गया। आक्रोशित छात्रों ने शिक्षा मंत्री और JAC अध्यक्ष का पुतला फूँक दिया। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पहले तो हल्का बल प्रयोग किया, लेकिन जब छात्र पीछे नहीं हटे तो लाठीचार्ज किया गया। लाठीचार्ज में कई छात्र घायल हो गए, जिनमें कुछ लड़कियाँ भी शामिल थीं। लड़कियों के घायल होने की खबर ने आग में घी का काम किया और विपक्षी छात्र संगठन भी समर्थन में उतर आए।

प्रदर्शन के दौरान कई मार्मिक दृश्य देखने को मिले। एक 17 वर्षीय छात्र, राहुल कुमार, जो घंटों से सड़क पर बैठा रो रहा था, उसने कहा – “मेरे पिताजी मजदूर हैं। उन्होंने मेरी पढ़ाई के लिए अपनी जमीन तक गिरवी रख दी है। मैंने कभी किसी कोचिंग का मुँह नहीं देखा, सिर्फ किताबें पढ़ीं। अब पेपर लीक की वजह से मेरी परीक्षा ही रद्द हो गई। मैं क्या बताऊँ अपने पिताजी को? कि ईमानदार होना पाप है?” राहुल का यह दर्द सिर्फ उसका अपना नहीं था, बल्कि लाखों गरीब और मध्यम वर्गीय छात्रों की त्रासदी थी, जो इस सिंडिकेट के सबसे बड़े शिकार बने।

प्रदर्शनकारियों की माँगें स्पष्ट थीं – तत्कालीन शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, JAC का पुनर्गठन, पेपर लीक के सभी दोषियों की संपत्ति जब्त कर जेल भेजना, और एक स्वतंत्र एजेंसी से पूरे मामले की जाँच। पूरे प्रदेश में यह आग फैल गई। धनबाद, बोकारो, देवघर, दुमका, और हजारीबाग में भी इसी तरह के प्रदर्शन हुए। कई जगहों पर छात्रों ने रेलवे ट्रैक पर धरना देकर ट्रेनों को रोक दिया, जिससे यात्री परेशान हुए लेकिन उनमें से अधिकांश ने छात्रों का समर्थन किया।

सरकार हरकत में आई। मुख्यमंत्री ने शाम को एक आपात बैठक बुलाई और अगले 48 घंटों में सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया। लेकिन छात्रों का गुस्सा इतनी आसानी से शांत होने वाला नहीं था। वे समझ चुके थे कि यह लड़ाई सिर्फ एक परीक्षा की नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ थी। उनकी आवाज़ राजधानी की सड़कों से निकलकर दिल्ली तक गूँजी और इस आंदोलन ने देश भर में पेपर लीक के खिलाफ एक नई बहस छेड़ दी।

Share this Article

Share This Story