SIT जांच के बड़े खुलासे: 50 से ज्यादा गिरफ्तारियाँ, 6 जिलों में फैला था नेटवर्क
मुख्यमंत्री के आदेश के बाद गठित विशेष जाँच दल (SIT) ने 40 दिनों की गहन पड़ताल के बाद जो प्रारंभिक रिपोर्ट पेश की, वह 700 पन्नों का एक ऐसा दस्तावेज था...

Key Highlights
- झारखंड पेपर लीक कांड पर विस्तृत और सच्ची रिपोर्टिंग।
- दलालों, अधिकारियों और प्रिंटिंग प्रेस के बड़े गठजोड़ का खुलासा।
- SIT की रिपोर्ट और गिरफ्तारियों पर एक्सक्लूसिव कवरेज।
रांची, 20 अप्रैल 2022: मुख्यमंत्री के आदेश के बाद गठित विशेष जाँच दल (SIT) ने 40 दिनों की गहन पड़ताल के बाद जो प्रारंभिक रिपोर्ट पेश की, वह 700 पन्नों का एक ऐसा दस्तावेज था जिसने पेपर लीक की भयावह गहराई को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। SIT ने कुल 54 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें बोर्ड के तीन वरिष्ठ अधिकारी, दो पुलिसकर्मी, एक बैंककर्मी और कई शिक्षक शामिल थे। यह नेटवर्क झारखंड के 6 जिलों – रांची, हजारीबाग, धनबाद, बोकारो, देवघर और गिरिडीह में जड़ें जमाए हुए था।
SIT की जाँच का सबसे बड़ा खुलासा यह था कि पेपर लीक की शुरुआत प्रश्नपत्र बनने की प्रक्रिया से ही हो जाती थी। जाँच में पाया गया कि JAC के प्रश्नपत्र मॉडरेशन पैनल में शामिल कुछ शिक्षक ही पेपर सेट करने के बाद उनकी हाथ से लिखी कॉपियाँ या सॉफ्ट फाइलें बाहर भेज देते थे। यह काम इतनी सफाई से किया जाता था कि सालों तक किसी को शक नहीं हुआ। मॉडरेटर अपने विषय के कुछ प्रश्नों को ‘बदलकर’ या ‘गलत’ बताकर अलग कर लेते थे और वही प्रश्न पैसे लेकर कोचिंग सेंटरों को पहुँचा देते थे। एक गिरफ्तार शिक्षक ने पूछताछ में कबूल किया कि उसे हर बार एक प्रश्नपत्र के लिए 1.5 लाख रुपये मिलते थे, और उसने पिछले 5 सालों में करीब 40 लाख रुपये कमाए थे।
SIT ने पाया कि इस नेटवर्क में हर जिले का एक ‘रीजनल हेड’ था, जो अक्सर उस जिले के किसी बड़े कोचिंग संचालक या पूर्व बोर्ड कर्मचारी को बनाया जाता था। रीजनल हेड का काम था अपने जिले में दलालों का नेटवर्क तैयार करना और पैसे का हिसाब-किताब रखना। SIT ने जब इनके ठिकानों पर छापेमारी की, तो हर जगह से एक जैसी ही चीजें मिलीं – नकदी के ढेर, बेनामी प्रॉपर्टी के कागजात, और चीन से मँगवाए गए उच्च गुणवत्ता के स्कैनर व प्रिंटर, जो तुरंत प्रश्नपत्रों की सैकड़ों प्रतियाँ तैयार कर सकते थे।
जाँच में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि इस नेटवर्क में सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी भी शामिल थे। जिन केंद्रों पर प्रश्नपत्र रखे जाते थे, वहाँ ड्यूटी पर तैनात दो सिपाही हर रात एक निश्चित समय पर ‘पेट्रोलिंग’ के बहाने बाहर चले जाते थे और तब तक दलाल आकर स्ट्रॉन्ग रूम से पेपरों की फोटो खींच लेते थे। इस सेवा के लिए दोनों सिपाहियों को हर रात 25,000 रुपये नकद दिए जाते थे।
SIT प्रमुख ने मीडिया को बताया कि यह पूरा ढाँचा किसी समानांतर सरकार की तरह काम करता था, जिसका अपना पदानुक्रम, अपनी सूचना प्रणाली और अपनी सजा व्यवस्था थी। जो दलाल समय पर पैसा नहीं पहुँचाता था, उसे नेटवर्क से बाहर कर दिया जाता था या उसकी पिटाई करवाई जाती थी। रिपोर्ट में सिफारिश की गई कि इस मामले में केवल बोर्ड स्तर पर नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा विभाग के प्रशासनिक ढाँचे में व्यापक सुधार की जरूरत है।
