विशेष संवाददाता | रमना/पुणे

समाज में बढ़ते ऐसे मामले, जहां प्रेम संबंधों को छुपाने के चक्कर में या तो परिवार अपनी ही संतान का जीते जी अंतिम संस्कार कर देते हैं, या फिर लड़कियां अपने ही प्रेमी की जान ले लेती हैं, एक गंभीर सामाजिक चिंता का विषय बन गए हैं। कुछ दिन पहले हमने आपको रमना की स्नेहा गुप्ता और रूपेश विश्वकर्मा की कहानी बताई थी। आज फिर से उसी मुद्दे पर चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि ये घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं।

रूपेश और स्नेहा का मामला: एक बार फिर से विस्तार से

जैसा कि हमने पिछली रिपोर्ट में बताया था, रमना निवासी स्नेहा गुप्ता और रूपेश विश्वकर्मा का 4 साल का प्यार था। लेकिन ये बात घरवालों को तब पता चली जब रूपेश का एक्सीडेंट हो गया। दरअसल हुआ यूं कि जब रूपेश का एक्सीडेंट हुआ, तब स्नेहा और रूपेश के बीच बात हुई थी। स्नेहा ने रूपेश से कहा था कि "मैं आ रही हूं, तुमसे मिलने।" लेकिन जैसे ही स्नेहा के घरवालों को इस बात की भनक लगी, उन्होंने सबसे पहले स्नेहा का फोन बंद कर दिया, ताकि वह रूपेश से दोबारा बात न कर सके। फोन बंद करने के बाद घरवालों ने बिना कोई बातचीत किए, चुपके से कहीं और स्नेहा की शादी सेट कर दी। घरवालों की सोच बस यही थी—"कहीं ये फंस न जाए। कहीं लड़की दोबारा उस लड़के से बात न कर ले।"

लेकिन इंसानियत तो उस वक्त पूरी तरह शर्मसार हो गई। जिस वक्त रूपेश को सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब स्नेहा के घरवालों ने न सिर्फ उसका फोन ऑफ कर दिया, बल्कि इंसानियत के नाते एक बार भी उससे मिलने नहीं गए। एक इंसान, जिसके साथ उनकी बेटी ने 4 साल बिताए थे, जो उनकी बेटी के दिल के सबसे करीब था, उसे उस मुश्किल घड़ी में बिल्कुल अकेला छोड़ दिया गया। न कोई फोन, न कोई हालचाल, न मिलने की इंसानी कोशिश—बस एक सुनियोजित चुप्पी। यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जो रिश्तों से ज्यादा समाज की राय को तरजीह देती है।

19 मई को जब स्नेहा अपनी परीक्षा देने गई और उसने रूपेश को फिर से देखा, तो वह रो पड़ी। आंखों में पूरा समंदर था, लेकिन बयां किससे करती? घरवालों को कौन बताए? यह वह दर्द है जो शब्दों में नहीं ढलता। उसी दौरान रमना में एक और खबर ने सबको झकझोर कर रख दिया—एक लड़की ने शादी के मंडप में सिंदूर लेने से ही मना कर दिया। और कुछ दिनों बाद उसी लड़की का उसके अपने घरवालों ने जीते जी अंतिम संस्कार कर दिया। यह घटना इस बात का सबूत है कि समस्या सिर्फ एक पक्ष तक सीमित नहीं है।

सिया गोयल और सोनम रघुवंशी: एक समान पैटर्न

यह सिर्फ रूपेश और स्नेहा की कहानी नहीं है। यह हर उस युवा पीढ़ी की त्रासदी है जो संवादहीनता और सामाजिक दबाव का शिकार होती है। हाल ही में चर्चा में आया सिया गोयल का मामला भी इसी ओर इशारा करता है, जहां एक युवती ने अपने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर अपने मंगेतर केतन अग्रवाल की लोहागढ़ किले पर पहाड़ी से धक्का देकर हत्या कर दी। इससे पहले सोनम रघुवंशी का मामला भी सुर्खियों में रहा था। ये सभी मामले एक ही जड़ से जुड़े हैं—अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने और "लोग क्या कहेंगे" के डर से सच को दबाने की प्रवृत्ति। इसी डर से लड़कियां लड़कों को मरवा देती हैं—कभी ड्रम में पैक करके, तो कभी पहाड़ी से गिरा देती हैं। बस इसलिए कि किसी को पता न चले। बस इसलिए कि समाज में इज्जत बची रहे। बस इसलिए कि "लोग क्या कहेंगे" का भूत सिर पर सवार रहता है। ये कोई फिल्मी स्क्रिप्ट नहीं, यही असली समाज है।