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'लोग क्या कहेंगे' की बलि: रमना की पुष्पा कुमारी और स्नेहा गुप्ता से लेकर सिया गोयल तक, इज्जत के नाम पर रिश्तों और जिंदगियों की हत्या का सिलसिला

समाज में बढ़ते ऐसे मामले, जहां प्रेम संबंधों को छुपाने के चक्कर में या तो परिवार अपनी ही संतान का जीते जी प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर समाज से बेदखल कर देते हैं, या फिर लड़कियां अपने ही प्रेमी की जान ले लेती हैं, एक गंभीर सामाजिक चिंता का विषय बन गए हैं।

ByThinkIndia.press Bureau
Published On 24 जून 2026
'लोग क्या कहेंगे' की बलि: रमना की पुष्पा कुमारी और स्नेहा गुप्ता से लेकर सिया गोयल तक, इज्जत के नाम पर रिश्तों और जिंदगियों की हत्या का सिलसिला
Representative Image [ThinkIndia.press Bureau]

विशेष संवाददाता | रमना/गढ़वा

समाज में बढ़ते ऐसे मामले, जहां प्रेम संबंधों को छुपाने के चक्कर में या तो परिवार अपनी ही संतान का जीते जी प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर समाज से बेदखल कर देते हैं, या फिर लड़कियां अपने ही प्रेमी की जान ले लेती हैं, एक गंभीर सामाजिक चिंता का विषय बन गए हैं। कुछ दिन पहले हमने आपको रमना की स्नेहा गुप्ता और रूपेश विश्वकर्मा की कहानी बताई थी। आज फिर से उसी मुद्दे पर चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि ये घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं।

रमना की पहली त्रासदी: स्नेहा गुप्ता और रूपेश विश्वकर्मा का मामलारमना की धरती पर प्रेम और इज्जत के बीच जो पहली बड़ी लड़ाई देखने को मिली, वह थी स्नेहा गुप्ता और रूपेश विश्वकर्मा की कहानी। दोनों 5 साल से साथ थे—एक ऐसा रिश्ता जो वक्त की कसौटी पर खरा उतर रहा था। लेकिन यह बात घरवालों को तब पता चली जब रूपेश का एक्सीडेंट हो गया। दरअसल हुआ यूं कि जब रूपेश का एक्सीडेंट हुआ, तब स्नेहा और रूपेश के बीच बात हुई थी। स्नेहा ने रूपेश से कहा था कि "मैं आ रही हूं, तुमसे मिलने।" लेकिन जैसे ही स्नेहा के घरवालों को इस बात की भनक लगी, उन्होंने सबसे पहले स्नेहा का फोन बंद कर दिया, ताकि वह रूपेश से दोबारा बात न कर सके। फोन बंद करने के बाद घरवालों ने बिना कोई बातचीत किए, चुपके से कहीं और स्नेहा की शादी सेट कर दी। घरवालों की सोच बस यही थी—"कहीं ये फंस न जाए। कहीं लड़की दोबारा उस लड़के से बात न कर ले।"

लेकिन इंसानियत तो उस वक्त पूरी तरह शर्मसार हो गई। जिस वक्त रूपेश को सबसे ज्यादा जरूरत थी, जब वो जिंदगी और मौत के बीच था और पता नहीं था कि कब क्या हो जाएगा, तब स्नेहा के घरवालों ने न सिर्फ उसका फोन ऑफ कर दिया, बल्कि इंसानियत के नाते एक बार भी रूपेश से मिलने नहीं गए। एक इंसान, जो 5 साल से उनकी बेटी के साथ था, जो उनकी बेटी के दिल के सबसे करीब था, उसे उस मुश्किल घड़ी में बिल्कुल अकेला छोड़ दिया गया। न कोई फोन, न कोई हालचाल, न मिलने की इंसानी कोशिश—बस एक सुनियोजित चुप्पी। यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जो रिश्तों से ज्यादा समाज की राय को तरजीह देती है。

19 मई को जब स्नेहा अपनी परीक्षा देने गई और उसने रूपेश को फिर से देखा, तो वह रो पड़ी। आंखों में पूरा समंदर था, लेकिन बयां किससे करती? घरवालों को कौन बताए? यह वह दर्द है जो शब्दों में नहीं ढलता।

रमना की दूसरी त्रासदी: पुष्पा कुमारी और पिता सुकट राम की कहानीरमना की धरती पर यह दूसरी बड़ी घटना थी जिसने समाज को शर्मसार कर दिया। यह कहानी है रमना के ही सुकट राम और उनकी बेटी पुष्पा कुमारी की। पुष्पा कुमारी बहुत छोटी थी, इतनी छोटी कि उसे जिंदगी के बड़े फैसलों की समझ भी नहीं थी। शादी के मंडप में जब आखिरी बार सिंदूर मांग भरने की रस्म हुई, तो पुष्पा ने एक गलती कर दी—उसने सिंदूर लेने से मना कर दिया। शायद वह डर गई थी, शायद उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, या शायद उसके मन में कोई और बात थी जिसे वह बयां नहीं कर पाई। एक छोटी सी बच्ची, जिसे अपने फैसले की गंभीरता का अंदाजा भी नहीं था, उसने बस इतना किया कि उस एक पल में सिंदूर नहीं लिया।

लेकिन उसके बाद जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला था। समाज ने उस छोटी सी बच्ची की एक गलती की इतनी बड़ी सजा दी कि सुनकर रूह कांप जाती है। पुष्पा के अपने ही घरवालों ने, समाज के दबाव में आकर, एक डमी बॉडी बनाकर उस जिंदा लड़की का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर दिया। जीते जी एक बेटी का कफन देखना—इससे बड़ी क्रूरता और क्या हो सकती है? उसे मारा तो नहीं गया, लेकिन उसके अस्तित्व को मिटा दिया गया। उसे समाज से निकाल दिया गया, परिवार से अलग कर दिया गया, हर उस जगह से बेदखल कर दिया गया जहां वह अपनी थी। एक जिंदा इंसान को मुर्दा घोषित कर देना—यह कैसी इज्जत है जो अपनी ही संतान को जिंदगी से खारिज कर देती है? यह कैसा समाज है जो एक बच्ची को उसकी एक गलती पर माफ नहीं कर सकता? उस बच्ची ने न किसी की जान ली, न कोई जुर्म किया, बस एक पल के लिए सिंदूर लेने से मना कर दिया। और उसकी सजा—सामाजिक मौत। इससे घिनौना और इंसानियत का हत्याकांड और क्या हो सकता है? शरीर तो जिंदा रहा, लेकिन आत्मा को मार दिया गया।

बेटी बाप से काफी छोटी थी। उसे जिंदगी का कोई अनुभव नहीं था। उसने गलती कर दी, लेकिन क्या उस गलती की सजा सामाजिक बहिष्कार और जीते जी अंतिम संस्कार हो सकती है? और वो भी अपनों के हाथों? समाज को आईना दिखाने वाला यह मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि हमारी सामूहिक सोच पर एक काला धब्बा है। जो समाज अपनी बेटियों को देवी मानता है, उसी समाज ने एक मासूम बच्ची को उसकी एक गलती पर जिंदा रहते हुए मुर्दा घोषित कर दिया, सिर्फ इसलिए क्योंकि "लोग क्या कहेंगे।"

सिया गोयल और सोनम रघुवंशी: एक समान पैटर्नयह सिर्फ रमना की पुष्पा कुमारी और स्नेहा गुप्ता की कहानी नहीं है। यह हर उस युवा पीढ़ी की त्रासदी है जो संवादहीनता और सामाजिक दबाव का शिकार होती है। हाल ही में चर्चा में आया सिया गोयल का मामला भी इसी ओर इशारा करता है, जहां एक युवती ने अपने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर अपने मंगेतर केतन अग्रवाल की लोहागढ़ किले पर पहाड़ी से धक्का देकर हत्या कर दी। इससे पहले सोनम रघुवंशी का मामला भी सुर्खियों में रहा था। ये सभी मामले एक ही जड़ से जुड़े हैं—अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने और "लोग क्या कहेंगे" के डर से सच को दबाने की प्रवृत्ति। इसी डर से लड़कियां लड़कों को मरवा देती हैं—कभी ड्रम में पैक करके, तो कभी पहाड़ी से गिरा देती हैं। बस इसलिए कि किसी को पता न चले। बस इसलिए कि समाज में इज्जत बची रहे। बस इसलिए कि "लोग क्या कहेंगे" का भूत सिर पर सवार रहता है। ये कोई फिल्मी स्क्रिप्ट नहीं, यही असली समाज है।

खामोशी का खतरनाक सफरइन सभी मामलों में एक आम बात निकलकर सामने आती है—संवाद का पूर्ण अभाव। कई बार युवा, विशेषकर लड़कियां, शर्म या डर के कारण अपने प्रेम संबंधों की बात घर में नहीं बतातीं। उनकी सोच होती है कि इससे घर में उनकी इज्जत बनी रहेगी और सब उन्हें अच्छा समझेंगे। लेकिन जब यह बात छुप नहीं पाती, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है। नतीजा—कभी कोई बेटी आत्महत्या कर लेती है, कभी मंडप में सिंदूर लेने से मना कर देती है, तो कभी अपने प्रेमी की जान लेने जैसा कदम उठा लेती है। और कभी-कभी तो समाज और परिवार ही मिलकर एक मासूम बच्ची का जीते जी प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर देते हैं और उसे हर जगह से बेदखल कर देते हैं, जैसा पुष्पा कुमारी के साथ हुआ।

दोनों पक्षों की जिम्मेदारीयह समझना जरूरी है कि इस समस्या के लिए सिर्फ एक पक्ष जिम्मेदार नहीं है। जहां परिवारों को अपनी सोच बदलने और बच्चों के लिए एक सुरक्षित माहौल बनाने की जरूरत है, वहीं युवाओं को भी सच बोलने का साहस दिखाना चाहिए। हिंदू धर्म सहित सभी धर्म एकता और समानता का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन जाति और सामाजिक हैसियत के नाम पर दिखावा अक्सर इन मूल्यों पर भारी पड़ जाता है। जो माता-पिता सोचते हैं कि "मेरी बेटी या मेरा बेटा ऐसा नहीं है," इस भ्रम को अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए। ज़माना बदल गया है। पुष्पा कुमारी का मामला तो यह भी सिखाता है कि समाज को अपनी उस सोच पर शर्म करनी चाहिए जो एक बच्ची की गलती पर उसे जिंदा रहते हुए मुर्दा घोषित करने का हुक्म देती है।

निष्कर्षइज्जत की आड़ में रिश्तों और जिंदगियों की हत्या बंद होनी चाहिए। बेटियों को डर नहीं, हक दीजिए। बेटों को संस्कार ही नहीं, समझ भी दीजिए। और सबसे जरूरी, "लोग क्या कहेंगे" की जंजीरों को तोड़िए। इंसानियत को बचाना है तो पहले इंसान बनना होगा—यह सबक रमना की पुष्पा कुमारी और स्नेहा गुप्ता से लेकर पुणे की सिया गोयल तक हर घटना चीख-चीखकर कह रही है। जब तक यह संवादहीनता और दिखावे की संस्कृति बनी रहेगी, तब तक सिया गोयल और सोनम रघुवंशी जैसी लड़कियां लड़कों को ड्रम में पैक करके मारती रहेंगी, पहाड़ी से गिराकर मारती रहेंगी। और तब तक पुष्पा कुमारी जैसी मासूम बच्चियां अपनों के हाथों जीते जी सामाजिक मौत का दंश झेलती रहेंगी।

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