विशेष संवाददाता
ये कहानी है रमना की स्नेहा गुप्ता और रूपेश विश्वकर्मा की। रूपेश और स्नेहा का 4 साल का प्यार था, लेकिन ये बात घरवालों को तब पता चली जब रूपेश का एक्सीडेंट हो गया। और जैसे ही लड़की के घरवालों को इस प्यार की भनक लगी, उन्होंने चुपके से कहीं और लड़की की शादी सेट कर दी। इतना ही नहीं, शादी तय होते ही लड़की का फोन बंद कर दिया गया, ताकि वो रूपेश से बात न कर सके। घरवालों की सोच बस यही थी—"कहीं ये फंस न जाए। कहीं लड़की दोबारा उस लड़के से बात न कर ले।"
लेकिन 19 मई को जब स्नेहा अपनी परीक्षा देने गई और उसने रूपेश को फिर से देखा, तो वो रो पड़ी। आंखों में पूरा समंदर था, लेकिन बयां किससे करती? घरवालों को कौन बताए? ये वो दर्द है जो शब्दों में नहीं ढलता। उसी वक्त रमना में एक और खबर ने सबको झकझोर कर रख दिया—एक लड़की ने शादी के मंडप में सिंदूर लेने से ही मना कर दिया। और कुछ दिनों बाद उसी लड़की का उसके अपने घरवालों ने जीते जी अंतिम संस्कार कर दिया।
ये सिर्फ रूपेश और स्नेहा की कहानी नहीं है। ये हर उस सिया गोयल की कहानी है, हर उस सोनम रघुवंशी की कहानी है, जिन्हें 'सम्मान' के नाम पर कुचला जाता है। और इसी डर से लड़कियां लड़कों को मरवा देती हैं—कभी ड्रम में पैक करके, तो कभी पहाड़ी से गिरा देती हैं। बस इसलिए कि किसी को पता न चले। बस इसलिए कि समाज में इज्जत बची रहे। बस इसलिए कि "लोग क्या कहेंगे" का भूत सिर पर सवार रहता है। ये कोई फिल्मी स्क्रिप्ट नहीं, यही असली समाज है।
लड़कियों की चुप्पी और घर का भ्रम
इसमें लड़कियों की भी गलती है। शर्म से या डर से, जब भी घर में शादी की बात चलती है, वो इस बात को छुपा लेती हैं कि वो किसी और से प्यार करती हैं। सोच यही होती है—"घर में मेरी इज्जत बनी रहे, सब मुझे अच्छा समझें।" लेकिन उन्हें ये बात बतानी चाहिए। और माता-पिता को भी पूछना चाहिए कि "क्या कोई नज़र में है?" लेकिन नहीं। सब यही सोचते हैं—कोई क्या सोचेगा, क्या बोलेगा? इसी सोच और डर की वजह से किसी की बेटी आत्महत्या कर लेती है, किसी के बेटे को मार देती है, तो कहीं मंडप में सिंदूर लेने से मना कर देती है।
यही वजह है कि केतन अग्रवाल के साथ सिया गोयल ने जो किया, या उससे पहले सोनम रघुवंशी वाला मामला—ये सब होता रहता है और होता रहेगा। जो माता-पिता सोचते हैं कि "मेरी बेटी या मेरा बेटा ऐसा नहीं है," इस भ्रम को अपने दिमाग से निकाल दीजिए। ज़माना बदल गया है।
सिया का सच और माता-पिता की जिद
सिया गोयल ने वही तो बताया—वो नहीं चाहती थी कि घरवालों को पता चले। वो घरवालों की नज़र में अच्छी बनकर रहना चाहती थी। उनकी बात मान भी ली, लेकिन अपने प्रेमी को छोड़ना भी नहीं चाहती थी। यहीं चीज़ और खतरनाक हो जाती है जब घरवाले जानते हुए भी कि लड़की किसी और को पसंद करती है, फिर भी अपनी समाज और जाति दिखाने के लिए उसकी शादी करने पर तुले रहते हैं।
जबकि हिंदू धर्म साफ कहता है—जाति-पाति कुछ नहीं है, सब एक समान हैं। लेकिन फिर भी माता-पिता दिखावा करने में लगे हैं—"देखो, हमने अपनी बेटी-बेटे की शादी कितनी ऊंची जगह की है।" यहां आकर माता-पिता भी गलत हैं। और हम ये बात रमना की स्नेहा गुप्ता के लिए भी कह रहे हैं, सिया गोयल के लिए भी, और सोनम रघुवंशी के लिए भी।
अंत में
इज्जत की आड़ में रिश्तों की हत्या बंद होनी चाहिए। और सबसे ज़रूरी, "लोग क्या कहेंगे" की जंज़ीरों को तोड़िए। क्योंकि सच्चाई यही है—जब तक घर की इज्जत बचाने के लिए बेटियों की खुशियां बलि चढ़ती रहेंगी, तब तक सिया गोयल और सोनम रघुवंशी जैसी लड़कियां लड़कों को ड्रम में पैक करके मारती रहेंगी, पहाड़ी से गिराकर मारती रहेंगी।

